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बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog – November 2016 Archive (1)

ग़ज़ल...भुलाने में मुझको ज़माने लगेंगे

बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम

फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन्

122 122 122 122

वो पलछिन सभी याद आने लगेंगे

भुलाने में मुझको ज़माने लगेंगे



यहाँ बैठ कर हमने खाई हैं कसमें

ये पत्थर सनम गुनगुनाने लगेंगे



यूँ ही रूठने मान जाने के मंजर

यकीं मानिये सब सुहाने लगेंगे



सरे आइना जो मेरा अक्स होगा

वो दर्पन से नजरें चुराने लगेंगे



सखी हाल दिल का कभी पूँछ लेगी

कभी हाले दिल आजमाने लगेंगे



(मौलिक एवं अप्रकाशित)

बृजेश कुमार… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 20, 2016 at 4:30pm — 16 Comments

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