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Er. Ganesh Jee "Bagi"'s Blog (125)

लघु कथा : रमजान (गणेश जी बागी)

क किलो मटन आज वास्तव में एक किलो का ही लग रहा था । मैंने तराजू और बाट पर नज़र दौड़ाई । मालूम हुआ दोनों बिल्कुल नये हैं । अभी पिछ्ले महीने ही मटन लेने आया था तो पुराना तराजू और घिसे हुए बाट थे । बाट के नीचे से लगा हुआ तब रांगा भी गायब था । एक किलो मटन मानो आठ सौ ग्राम का ही लगता था | 
दुकान पर मौजूद छोटू से मैने धीरे से पूछ ही लिया, "क्या बात है जी, नया तराजू, नये बाट?.." 

छोटू दुकान मालिक की नज़र बचा कर फुसफुसाया, "सर, रमजान का महीना है ना,…
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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 8, 2013 at 10:52pm — 52 Comments

लघु कथा : दर्द (गणेश जी बागी)

ज फिर किसी ने पारस को चाकू मार दिया था, उसकी किस्मत अच्छी थी कि घाव बेहद मामूली था.  डाक्टर बाबू देखते ही पारस को पहचान गये, क्योंकि कोई आठ दस महीने पहले की ही तो बात है जब पारस के घर मे डकैती हुई थी और बदमाशों ने पारस के शरीर पर चाकू से अनगिन वार किये थे, तब इलाज के लिए उसे इसी डाक्टर के पास लाया गया था, गंभीर रूप से ज़ख़्मी होने के बावजूद भी इस बहादुर नौजवान के मुँह से उफ़ तक नहीं निकली थी, लेकिन इस बार अत्यधिक…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 15, 2013 at 5:30pm — 63 Comments

मर्द // गणेश जी "बागी"

आज फिर उसका मन व्यथित था
हाहाकार कर रहा था हृदय
एक कथित पुरुष में
हैवान साकार हुआ था फिर.. 
फिर हैवानियत जीत गई थी 
नरपिशाच के पंजों में
आ गई थी 
फिर एक नन्ही…
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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 23, 2013 at 10:00pm — 36 Comments

तुम कैसे श्रेष्ठ ? // गणेश जी "बागी"

हे पूज्य !

आप ग़लत थे,

मैं सही था |

आप के कहे को

मान दिया था,

अनुचित आदेश को

मान लिया था |

आप पर विश्वास था,

मिला था आशीर्वाद-

एक अफलित आशीर्वाद |

हे पूज्य!

आप ग़लत थे,

मैं सही था |

आपने तोड़ा था विश्वास,

किंचित, मुझे नही मानना था

संकुचित आदेश,

मुझे नही देना था-

अंगूठा,

दिखला देना था-

अंगूठा,



क्या होता ?

नालायक कहलाता !

अल्प काल के…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 16, 2013 at 8:30pm — 23 Comments

अंतर्द्वंद्व // गणेश जी "बागी"

ठगती है,

बार बार,

अंतरात्मा,

आश्वासनों से,

ठीक हो जाएगा,

सब ठीक हो जाएगा,

एक अंतर्द्वंद्व,

सत्य असत्य,

दिल दिमाग़ के मध्य,

नही डिगेगा,

कभी नही डिगेगा,

चलते जाना है,

सत्य के मार्ग पर,

जो घटित होना है,

हो जाय,

कौन अमर यहाँ,

कोई नही,

कोई भी तो नही,

फिर डर कैसा,

उस अहंकार से,

जो क्षण भंगुर है,

चल हट !

चलने दे,

कार्य पथ पर बढ़ने दे,

वो सामने देख…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 13, 2013 at 8:00pm — 38 Comments

लघुकथा : ईलाज / गणेश जी बागी

लघुकथा : ईलाज
                  न दिनों मेरी नियुक्ति सुदूर जिले में थी । घर पर छुट्टियाँ बिता कर वापस ड्यूटी पर जा रहा था । आने जाने हेतु एकमात्र साधन ट्रेन ही थी । छोटी लाइन की पैसेंजर ट्रेन से यात्रा करनी पड़ती थी । जाड़े का मौसम था । रात 11 वाली पैसेंजर ट्रेन मिली थी । भीड़ बहुत…
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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 1, 2013 at 11:00pm — 45 Comments

लघुकथा : उत्प्रेरण / गणेश जी बागी

"माँ टिफिन बैग में रख दी हो ना",  पूछते हुए राहुल बैग लेकर स्कूल निकल गया। कालोनी के आठ-दस लड़के एक ही स्कूल में पढ़ते थे। साथ ही स्कूल जाते थे।

इधर राहुल में एक बदलाव मैंने नोट किया था । टिफिन ले जाने में आनाकानी करने वाला राहुल जो मुश्किल से दो पराठे लेकर जाता, अब तीन पराठे लेकर जाने लगा था । दोपहर में पडोसी मिसेज गुप्ता मिल गई थी बताने लगी कि राहुल और उसका ग्रुप आज कल समाज सेवा में लगा है । …

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 15, 2013 at 10:38pm — 28 Comments

लघु कथा :- कुत्ते की दुम / गणेश जी बागी

दारोगा बाबू का स्थानांतरण शहर से दूर एक छोटे थाने में कर दिया गया था । काफी शिकायतें आयीं थी, कि बगैर घूस लिए काम ही नहीं करते थे । नया क्षेत्र बहुत ही शांत था। थाने में कोई केस नहीं । सभी सिपाही, हवलदार, दिन भर मानों समय काटते । जैसे तैसे एक महिना निकल गया, 'बोहनी’ तक नसीब नहीं हुई थी । 

"राम सिंह, जरा इधर तो आओं"
"जी सर", राम सिंह सिपाही दौड़ते हुए आया…
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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 13, 2013 at 3:00pm — 35 Comments

हास्य घनाक्षरी - 2 / गणेश जी बागी

घनाक्षरी

आया मैं तो कुम्भ में कि, पाप कुछ…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 6, 2013 at 5:30pm — 20 Comments

हास्य घनाक्षरी - 1 / गणेश जी बागी

(1)

कुत्ते संग सोते हुए, फोटो एक खिचवा के,

फेस बुक पे झट से, चेंप दी मैडम जी |

लाइक और कमेंट बीच एक श्रीमान ने,

लिख दिया काश होता, कुत्ता मैं मैडम जी |

उल्टा पुल्टा सोचो नहीं, कुछ भी यूँ लिखो नहीं,

ये तो…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 31, 2013 at 2:00pm — 24 Comments

लघु कथा :- सौदा

इशरत गंज उस शहर में देह बाज़ार का नाम था और लैला उस बाज़ार का एक हिस्सा थी । बाज़ार से सटे चौराहे पर मोती लाला की…
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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 11, 2012 at 12:00am — 43 Comments

लघुकथा :- तरकीब

लघुकथा :- तरकीब

ठाकुर साहब की चाकरी करते करते भोलुआ के बाबूजी पिछले महीने चल बसे, अब खेत बघार का सारा काम भोलुआ ही देखता था, बदले मे ठाकुर साहब ने जमीन का एक टुकड़ा उसे दे दिया था जिससे किसी तरह परिवार चलता था | ठाकुर साहब भोलुआ को बहुत मानते थे, सदैव भोलू बेटा ही कह कर बुलाते थे | ठाकुर साहब द्वारा इतना सम्मान भोलुआ के प्रति प्रदर्शित करना उनके बेटे विजय बाबू को…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 21, 2012 at 8:30pm — 21 Comments

लघु कथा :- रक्त पिपासु

लघु कथा :- रक्त पिपासु…
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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 9, 2012 at 11:00am — 38 Comments

लघुकथा : सुहागन

लघुकथा : सुहागन …

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 25, 2012 at 10:30am — 40 Comments

लघु कथा : विरोध / गणेश जी "बागी"

लघु कथा : विरोध

यह तकरीबन रोज़ का ही किस्सा था कि कालोनी के बच्चे भोली भाली तूलिका का खिलौना छीन लेते और वह रोते-रोते घर आती और हर बार उसकी मम्मी समझा बुझाकर उसे शांत करा देती | आज शाम उसके मम्मी पापा बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे, तभी तूलिका भागी भागी घर आई और उसके पीछे रोते हुए राहुल को लेकर उसकी मम्मी भी आ पहुंची |

"देखिए बहन जी, आपकी बेटी ने मेरे राहुल को कितना मारा" राहुल के गाल पर पड़े चांटे का निशान दिखाते हुये राहुल की मम्मी बोलीं |

"तूलिका इधर आओ, तुमने…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 20, 2012 at 7:00pm — 31 Comments

लघु कथा : उत्तरदायित्व

उत्तरदायित्व



कार्यालय में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी का माहौल था । नये साहब प्रभार ग्रहण कर रहे थे जो कड़े अनुशासन और अपने सख्त स्वभाव के लिए जाने जाते हैं | प्रभार ग्रहण करने के साथ ही उन्होंने पहला सवाल दागा - "कार्यालय की कार्यावधि क्या है ? और, सभी कर्मी कब तक कार्यालय आ जाते हैं |"



"सर कार्यालय अवधि सुबह १० बजे से शायं ५ बजे तक है और सभी कर्मचारी अमूमन ११ बजे तक आ ही जाते हैं."



"अब ऐसा नहीं चलेगा, कल से सबकी उपस्थिति सुबह १० बजे देखी जायेगी…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 13, 2012 at 1:30pm — 36 Comments

लघु कथा : ????

"चल कल्लुआ जल्दी से दारु पिला, आज मैं बहुत खुश हूँ |"…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 14, 2012 at 3:30pm — 36 Comments

लघुकथा : खौफ़

ट्रेन तकरीबन आधी रात के समय स्टेशन पर पहुंची, राजीव एक हाथ में सूटकेस संभालते पत्नी निधि को साथ लेकर जल्दी से ट्रेन से उतरा, अमूमन चहल पहल वाले इस स्टेशन पर सन्नाटा पसरा था, वहां केवल तीन चार ऑटो रिक्शा वाले ही मौजूद थे किन्तु उनमे भी सवारी बैठाने की कोई चिल्ल पौं न थी | राजीव ने बारी बारी सभी से कृष्णा कालोनी चलने को कहा, लेकिन कोई जाने को तैयार ही नहीं हुआ, तो उसने पूछा,

"आखिर बात क्या हैं, क्यों नहीं जाना चाहते ?"

"शहर के हालत अच्छे नहीं है बाबूजी, आज कुछ असामाजिक तत्वों ने…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 10, 2012 at 9:37pm — 39 Comments

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