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Chetan Prakash's Blog (68)

रोटी

गोल -गोल होती है रोटी

 गाँव-गाँव से शहर आता

आकर अपना खून बेचता

वो गँवार आदमी देखो तुम

रोटी खातिर महल बनाता |

गोल- गोल होती है रोटी...!

सच्चा कर्म-योगी वही है

प्याज-हरी धर खाता रोटी,

धरती माँ का पुत्र वही है

मोटी- मोटी उसकी रोटी |

गोल-गोल होती है रोटी..!

दुनिया बनी ये काज रोटी

बाल-ग्वाल कमा रहे रोटी

सारा शहर रचा हे, रोटी,

गाँव- गाँव बना है रोटी |

गोल-गोल होती है…

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Added by Chetan Prakash on December 3, 2020 at 7:26am — 3 Comments

दौड़ अपनी-अपनी (लघु- कथा)

कल मानव और विभा की शादी के दस वर्ष पूरे हो रहे थे। सो इस बार की मैरिज एनीवर्सरी विशेष थी। दाम्पत्य जीवन में कोई अभाव प्रकटतः तो विभा को नहीं था। दो बच्चे, बेटी मानसी और बेटा विशेष प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे थे। विभा एम, ए. बी. एड. थी, मिजाज़ से हाउस वाइफ थी। सारा दिन चौका बर्तन, सफाई, बच्चों की सुख-सविधा में कोई कमी न रहे इसमें निकल जाता था । हाँ मानव से ज़रूर उसे शिकायत थी। मानव एक कस्बे के महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्रवक्ता थे। उनका ज्यादातर समय अध्ययन और अध्यापन में ही निकल जाता और बचता…

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Added by Chetan Prakash on November 29, 2020 at 6:00am — 3 Comments

ग़ज़ल

212 212 212 2

राज़ आशिक़ के पलने लगे हैं

फूल लुक-छिप के छलने लगे है

उनके आने से जलने लगे हैं

मुँह-लगे दिल तो मलने लगे हैं

कोई आता है खिड़की पे उसकी

रात में गुल वो खिलने लगे हैं

चल रही है मुआफिक हवा भी

बागवाँ फूल फलने लगे हैं

आज पूनम दुखी है बहुत सुन !

आँख में ख्वाब खलने लगे हैं

रंग सावन ग़जल आ घुले फिर

अब तो चेतन बदलने लगे हैं

मौलिक एवं…

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Added by Chetan Prakash on November 23, 2020 at 6:30pm — 2 Comments

फैसला (लघुकथा)

आज मम्मी जी पापा जी छोटे के लिए लड़की देखने जा रहे। हम दो भाई है, छोटे भाई का नाम अभिषेक है। मुझे तो बैंक जाना था, फरवरी मार्च दो महीने, बैंक से छट्टिया वैसे भी नहीं मिलतीं। सास- ससुर की लाड़ली बड़ी बहू उनके साथ जारही थी। बहुत खुश थी, बड़ी बहू-चयन का विशेष दायित्व जो मिल गया था। पापा जी ने तो कह दिया था, हम ठहरे पुराने जमाने के लोग, आजकल जो अपेक्षाएं, एक बहू से परिवार को हो सकती है तुम बेहतर जानती हो। ड्राईवर के आते ही कहा, गाड़ी लगाओ, रामबीर चार घंटे का रास्ता है । बारह बजे तक पहुँचना है,…

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Added by Chetan Prakash on November 8, 2020 at 7:00pm — 6 Comments

सरस्वती वंदना

वीणावादिनी सरस्वती,

माँ शारदे भारती वर दे !

अँधकार की गर्द बढी है

सूरज की रौशनी घटी है

रतौँधी से ग्रस्त है मानव,

कवि की दृष्टि पड़ी धुँधली है

शिव-नेत्र -कवि हृदय जगा दे !

कि माँ शारदे रात जगा दे

जग से अँधकार मिटा दे

वर दे माँ शारदे वर दे !

तमसो मा ज्योतिर्गमय मंत्र

समस्त विश्व प्रसारित कर दे !

द्रोही हैं जो मानवता के

जन-धन की आवश्यकता के

चुन-चन कर संहार करो माँ

वंचित जन-मन…

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Added by Chetan Prakash on October 29, 2020 at 1:00pm — 3 Comments

रोटी.....( अतुकांत कविता)

रोटी का जुगाड़

कोरोना काल में

आषाढ़ मास में

कदचित बहुत कठिन रहा

आसान जेठ में भी नहीं था.

पर, प्रयास में नए- नए मुल्ला

अजान उत्साह से पढ रहे थे...

दारु मृत संजीवनी सुरा बन गयी थी

सरकार के लिए भी,

कोरोना पैशैन्ट्स के लिए भी

और, पीने वालों का जोश तो देखने लायक था,

सबकी चाँदी थी...!

आषाढ़ तो बर्बादी रही..

इधर मानसून की बारिश

उधर मज़दूरो की भुखमरी

और, बेरोज़गारी.....

सच, मानो कलेजा मुुँह

को आ गय़ा...!…

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Added by Chetan Prakash on July 11, 2020 at 1:00pm — No Comments

हादसा

बाबू राम नाथ पचहत्तर पार कर चुके हैं। शरीर अब जवाब देने लगा है। अभी कई दिन पहले जरा डाॅक्टर से चैक-अप कराने गये थे कि देर तक धूप में खड़ा रहना पड़ा । घर लौटते तेज़ बुखार हो गया। बेटा संयोग से इस वीक एन्ड पर सपत्नीक चला आया। दोनों बहनें जो अपने बच्चों के गर्मियो की छुट्टियों में आयी हुईं थी।सो डाॅक्टर को घर बुला लाया।

"हीट स्ट्रोक हुआ है', ङाॅक्टर बोला था। दवा दे गया था। अब आराम था। लेकिन कमजोरी बहुत थी। लू मानो सारा खून चूस गई थी। बाथरूम भी मुश्किल से जा पाते थे।



अभी कल…

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Added by Chetan Prakash on June 30, 2018 at 6:00pm — 14 Comments

नई सुबह

नई सुबह का इन्तिज़ार

मुझे भी है.....

काले पीले पत्ते पेड़ों पर

सूखगए हैं, किसी नमी

आँखों में पानी नहीं है

हो गयी हैं निष्ठुर पीतल सी !

नई सुबह क्या बेहतर होगी

प्रश्न खड़ा है, मेरे सम्मुख

नये साल का मैं लिखूँ क्या

आमुख.......?

हर दिन एक नया दिन होता है

कल से आज सदा बेहतर होता है

निर्विवाद यह उक्ति अब तो

शरमाई सी अलग खड़ी है......!

नई सुबह का इन्तिज़ार भी

करना बेमानी है, यारो !

परिवेश जब इतना अंधकार मय है

पौ…

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Added by Chetan Prakash on January 1, 1970 at 12:00am — 1 Comment

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