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आशीष यादव's Blog (67)

मेरा भारत अपना भारत ना जाने कहाँ खो गया

मेरा भारत अपना भारत ना जाने कहाँ खो गया

उसके सारे चिन्ह खो गये, कैसा ये बदलाव हो गया

नही रही अब गुरु की गुरुता, नही रहे वो शिष्य महान

काट अँगूठा तक दे देते थे करते गुरु का सम्मान

आज के युग में शिक्षा क्या, बस पैसों का व्यापार हो गया

मेरा भारत अपना भारत ना जाने कहाँ खो गया

नही रही धुन बाँसुरिया की, जो छेड़ा करती थी तान

कहाँ थाप तबले ढोलक की, कहाँ नगाड़े का है मान

आज कान के परदे फट जाते ऐसा संगीत हो गया

मेरा भारत अपना भारत ना जाने कहाँ खो…

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Added by आशीष यादव on July 26, 2012 at 5:59pm — 19 Comments

मै विद्रोह कराऊँगा

आज बनूँगा मै विद्रोही, अब विद्रोह कराऊँगा|

जो सबके ही समझ में आये, ऐसे गीत सुनाऊँगा||

बहुत हो गया अब न रुकूँगा, मै रोके इन चट्टानों के,

बहुत बुझ चुका अब न बुझूँगा मै पड़कर इन तूफानों मे।

कर के हलाहल-पान आज मै होके अमर दिखा दूँगा,

और बुलबुलों को बाजों से लड़ना आज सिखा…

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Added by आशीष यादव on June 5, 2012 at 8:00am — 19 Comments

ऐ मन निराश तुम मत होना

ऐ मन निराश तुम मत होना, मंज़िल तुझको मिल जायेगी

अपना न कभी धीरज खोना, फिर तो दुनिया हिल जायेगी।।



चलते रहना, बढ़ते रहना, इस कठिन डगर में रुकना मत

लाखों विपत्ति आ जाय सामने, किसी के आगे झुकना मत।

हौसला कभी भी मत खोना, विपदा आयेगी जायेगी।।

ऐ मन निराश तुम मत होना, मंज़िल तुझको मिल जायेगी।।



उलझनें बहुत सी आयेंगी, कुछ लोग तुम्हे बहकायेंगे

रोकने को तुझको क्षणिक फूल खुश्बू अपनी महकायेंगे।

बढ़ते रहना फिर देखोगे कलियाँ खिलती ही जायेंगी।।

ऐ मन निराश… Continue

Added by आशीष यादव on June 1, 2012 at 8:30am — 8 Comments

अरबों माल डकार के

अरबों माल डकार के राजा जी गै छूट।
जनहित में संदेश है लूट सके तो लूट।।

निकले जब वो जेल से यूँ दिखलाया रंग।
अभिवादन थे कर रहे जीत लिया ज्यों जंग।।

बाहर आकर वायु मे चुम्बन रहे उछाल।
इतने घृणीत कर्म का कोई नही मलाल।।

हर्षित चेलाराम के जमीं न पड़ते पाँव।
बेशरमी रख ताख पे खुश हो करते काँव।।

झिंगुर घुरवा से कहे "जितबे तुहीं चुनाव।
कट्टा पिस्टल साथ हैं डर जइहैं सब गाँव"।।

  • आशीष यादव

Added by आशीष यादव on May 17, 2012 at 9:00am — 22 Comments

ये साथ बिताए लम्हें, तुम्हे याद बहुत आयेंगे

ये साथ बिताए लम्हें, तुम्हे याद बहुत आयेंगे,

जब सोचोगे हो तन्हा तो तुमको तड़पायेंगे।।।।



वो फर्स्ट…

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Added by आशीष यादव on May 1, 2012 at 10:30pm — 14 Comments

एक पैग (कहानी)

बटेश्वरनाथ गाँव के सबसे बड़े आदमी हैं। भगवान का दिया हुआ सबकुछ है उनके पास। माता पिता अभी सलामत हैं। दो लड़के और एक लड़की भी है। बड़ा लड़का गटारीनाथ ८ साल का है। लड़की सुनयनी ६ साल की और सबसे छोटा लड़का मेहुल नाथ अभी ३ साल का है जिसे प्यार से सब मेल्हू कहते हैं।

 बटेश्वरनाथ के पिता कोई ३ साल पहले रिटायरमेन्ट लिये थे जब मेल्हू का जन्म हुआ था। रिटायरमेन्ट के समय खूब सारा पैसा भी मिला था। ये लोग खानदानी रईस भी थे। बटुकनाथ के पिता बहुत सारा पैसा छोड़ गये थे। इनके परिवार की खूबियाँ बहुत…

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Added by आशीष यादव on March 17, 2012 at 9:00am — 16 Comments

हम अब नहीं फंसने वाले (कविता )

क्यों आज तुम्हे अब चैन नहीं है महलों में?,

लाखों के बिस्तर पर भी नींद नहीं आती?
क्यों घूम रहे हो आज मध्य तुम जनता के,
क्यों आज बार की परियां तुम्हे नहीं भातीं?




वो पांच सितारा होटल, जहाँ ठहरते…
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Added by आशीष यादव on January 24, 2012 at 3:00pm — 27 Comments

भादों की अमावास

अमावास की रात अब बहुत सुकून देती है

वो भी भादों की अमावास हो तो क्या कहने

उसके अलावा हर रात को…

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Added by आशीष यादव on September 12, 2011 at 1:00pm — 16 Comments

चुड़ैल

 

            मै पश्चिम वाली कोठरी में आलमारी पर पड़े सामानों को इधर-उधर कर के देख रहा था| तभी मेरी नज़र एक निमंत्रण कार्ड पर पड़ी| कार्ड के ऊपर देखने पर पता चला की वो निमंत्रण भैया के नाम से था, प्रेषक वाली जगह के नाम से मै अनजान था| कौतुहल वश मैंने बड़ी आसानी से अन्दर के पत्र को निकाल कर देखा, अगले दिन बारात आने वाली थी| दर्शनाभिलाषी में पढने पर ज्ञात हुआ की वह निमंत्रण भैया के एक मित्र के बहन की शादी का था| मै और भैया एक ही स्कूल में पढ़े थे और उनके लगभग सारे मित्र मुझे भी…

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Added by आशीष यादव on August 10, 2011 at 10:00am — 11 Comments

क्यों तू ही मन को भाये...

और बहुत कुछ जग में  सुन्दर, फिर क्यों तू ही मन को भाये|

आग बुझाता है जब पानी, ये बरखा क्यों अगन लगाए||



जी करता है, पिघल मै जाऊं, तेरे साँसों  की गरमी में|

अजब सुकून मुझे मिलता है तेरे हाथों की नरमी से||

मै तुझमे मिल  जाऊं ऐसे, कोई भी मुझको ढूंढ़ न पाए|

आग बुझाता है जब पानी, ये बरखा क्यों अगन लगाए|

और बहुत कुछ जग में सुन्दर, फिर क्यों तू ही मन को भाये|



जब-जब गिरती नभ से बूँदें  , मै पूरा  जल जल जाता हूँ|

जी करता है भष्म  हो जाऊं, पर तुमको…

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Added by आशीष यादव on August 3, 2011 at 6:30pm — 18 Comments

अब जाना जफा ज़माने की......................

सजा मिली है मुहब्बत में वफ़ा  निभाने की|

अब जाना जफा ज़माने की.......................
उसने पल भर में उम्मीदों का गला घोंट दिया|
जिंदगी भर न भूलू उसने ऐसी चोट दिया|-२
हसरतें रह गयी पलकों पे उसे सजाने की|
अब जाना जफा ज़माने की......................
उसने इकरार मुहब्बत का बार -बार किया|
मैंने भी बेसुध बेख़ौफ़ उसे प्यार दिया|
यही तमन्ना अब उसको भूल जाने की,
करूँ तमन्ना अब उसको भूल जाने की|
अब…
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Added by आशीष यादव on March 10, 2011 at 2:25pm — 15 Comments

तुम

तुम्हारे ही सहारे से मेरा हर पल गुजरता है,

तुझ में डूब कर के ही मेरा पल-पल गुजरता है|



मै कितना प्यार करता हूँ तुम्हे किस तरह बतलाऊं,

जो बेहोश हूँ तेरी याद में क्यों होश में आऊं|



हसीं हो तुम बहुत सचमुच बहुत ही खुबसूरत हो,

बस आशिक मै नहीं तेरा, सभी की तुम जरुरत हो|



तुम्हारे होंठ तो मुझको कोई गुलाब लगते है,

तुम्हारी झील सी आँखें है या शराब लगते है|



गुजारूं रात मै कोई तेरी जुल्फों की छावों में,

यही इच्छा मेरी बस जाऊं मै तेरी… Continue

Added by आशीष यादव on February 4, 2011 at 7:47am — 12 Comments

वो कौन है-2

वो कौन है,

 

अतीत जैसा पास है,

या कि मेरा आज है,

व आगे का एहसास है|

मैं फंसा इन उलझनों में, सोचता,

वो कौन है|

 

जो गा सकूँ वो गान है,

कि मिला सकूँ वो तान है,

या कि मेरा सम्मान है|

ये सुलझ जाए पहेली, जान लूँ,

वो कौन है|

 

मधुरव भरा वो साज है,

या कि नवोढ़ा लाज है,

मेरे लिए क्यूँ राज है?

एक रूप सदिश बने तब, कह सकूँ,

वो कौन है|

 

गुल है वो कि बाग़…

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Added by आशीष यादव on January 13, 2011 at 9:32am — 14 Comments

बहार की व्यथा

बहार की व्यथा



अभी कुछ साल ही तो बीते हैं |

बसंत की तरह निरंतर प्रसन्नचित,

उजड़े चमन को भी खिला देने वाला मै,

साथ लिए चलता था सुरभित मलय पवनों को |



हर-एक गुलशन को चाहत थी मेरी,

मेरे स्पर्शों की, मेरे छुवन की |

हर कली मेरा स्पर्श पाकर फूल होना चाहती थी |

मै भी खुश होता, सबको खुश करता, आगे बढ़ जाता |



धीरे-धीरे सब कुछ बदला |

जगह, समाज, धर्म, मंदिर, मस्जिद,

मतलब सब कुछ |

तब मुझे दुःख नहीं हुआ |

मै क्या जानता था की इस…

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Added by आशीष यादव on November 19, 2010 at 11:00am — 16 Comments

मै आइना हूँ

मै, जो वाकिफ करता हूँ तुमको, तुमसे|

पहचान बताता हूँ तुम्हारी|

क्या हो तुम, किस बात पे गुरुर है तुम्हे,

सब दिखता हूँ मै|



खामियां क्या हैं? झलक रही हैं चेहरे पर,

ये मै ही हूँ, जो तुम्हे दिखता हूँ,

और बताता हूँ की तुम क्या हो|



आओ मेरे सामने, हकीकत बयां करूँगा|

यदि तुम मुझे तोड़ भी दो तो भी

तुम्हारी बुराइयां नहीं छिपेगीं|

मेरे टुकडो के बराबर गुना तुम्हारी खामियां नज़र आएगी|



इतने दूर क्यों खड़े हो?

कितने ऊँचाई पर हो, आओ मै… Continue

Added by आशीष यादव on November 19, 2010 at 10:43am — 5 Comments

मैंने सारे बंधन तोड़ दिए

मैंने सारे बंधन तोड़ दिए,

भंवर में ही उनको छोड़ दिए|

ऐसा उसने कहा था|



ये है बिलकुल हकीकत,

रहा मै वहीँ तक|

साथ में औरों को जब

वो जोड़ लिए........

मैंने सारे..................



वाकई मै गलत था,

इसका क्या मतलब था?

कुछ कहे ही बगैर

उनको छोड़ दिए............

मैंने सारे......................



नाव फिर कभी न बहती,

भार भी न वो सहती|

साथ दोनों को तन्हा ही

छोड़ दिए..................

मैंने… Continue

Added by आशीष यादव on November 15, 2010 at 10:00am — 6 Comments

बनकर साकी आया हूँ

बनकर साकी आया हूँ मै आज जमाने रंग|

ऐसी आज पिलाऊंगा, सब रह जायेंगे दंग||



अभी मुफिलिसी सर पर मेरे, खोल न पाऊं मधुशाला|

फिर भी आज पिलाऊंगा मै हो वो भले आधा प्याला|

ऐ मेरे पीने वालों तुम, अभी से यूँ नाराज न हो|

मस्त इसी में हो जावोगे, बड़ी नशीली है हाला|



एक-एक पाई देकर मै जो अंगूर लाया हूँ|

इमानदारी की भट्ठी पे रख जतन से इसे बनाया हूँ|

तनु करने को ये न समझना, किसी गरीब का लहू लिया|

राजनीति से किसी तरह मै अब तक इसे बचाया हूँ|



हर बार… Continue

Added by आशीष यादव on November 11, 2010 at 2:30pm — 11 Comments

सब्र की इन्तहा

इन्तहा है, हमारे सब्र की,
न जाने कब ये खत्म होगी,
जाने कब जागेंगे, और कसेंगे पीठ अपनी,
कब सचेत होंगे,
कब रोकेंगे हम विध्वंस को|
क्यों हम कहते हैं की मान जाओ,
जबकि हम जानते है,
वो कहने से नहीं मानेंगे,
वो नहीं समझेंगे मानवता को|
हम अपने सामर्थ्य से रोक सकते हैं उन्हें,
फिर भी सब्र किये बैठे हैं|
बहुत बड़ी इन्तहा है हमारे सब्र की,
अनंत तो नहीं, पर उसकी ही ओर|

Added by आशीष यादव on October 9, 2010 at 9:30am — 14 Comments

वो कौन है जिसकी याद सताती है हमें||

वो कौन है जिसकी याद सताती है हमें|

न जाने किस तरफ ये रोज बुलाती है हमें||



खोजता हूँ मै उसे मिलती नहीं वो मुझको|

रात को लेकिन चुपके से जगाती है हमें||



कहीं मिले जो कभी मुझसे साफ़ कह दूँ मैं|

की कौन है और ऐसे सताती है हमें||



देर तक तन्हा बैठ कर के यूँ ही सोचते हैं|

फिर याद उसकी जमीं महफ़िल में लाती है हमें||



फूल के जैसे खिल के वो मेरे सिने में|

साथ हूँ इसका एहसास कराती है हमें||



एक अनजान सहारा सी बन गयी है वो|

अश्क… Continue

Added by आशीष यादव on October 9, 2010 at 8:52am — 18 Comments

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