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नादिर ख़ान's Blog (47)

वही हँसाता है हमें, वही रुलाता है

वही हँसाता है हमें, वही रुलाता है

गम ओर ख़ुशी देकर आज़माता है

 

अपनों की अहमियत भी सीखाता है

बिछुडों को फिर वही मिलाता है

 

यकीं खुदा का तो बड़ा सीधा है

मारता है वही,वही जिलाता है

 

इसका उसका क्या है जग में

सबका हिस्सा तो वही बनाता है

 

नेमतें उसकी तो बड़ी निराली है

छीनता है कभी,कभी  दिलाता है

 

मेरे घर में कभी तुम्हारे घर में

खुशियाँ भी तो वही पहुँचाता है

 

आखिर भूले…

Continue

Added by नादिर ख़ान on October 17, 2012 at 11:15am — No Comments

हाईकु

जिम्मेदारियाँ

हो राज या समाज

धर्म निभाना

 

जिम्मेदारियाँ

खुद का आंकलन

जाँच परख

 

जिम्मेदारियाँ

जब भी हो चुनाव

खरा ही लेना

 

जिम्मेदारियाँ

धरती या आकाश

प्यार ही बाँटे

Added by नादिर ख़ान on October 16, 2012 at 12:44pm — 3 Comments

जमें रहना है

तालाब में मगरमच्छ

शिकार की तलाश में हैं

गिरगिट अपना रंग बदले

दबे पाँव जमे हैं

मकड़ियाँ जाल बुनने में

व्यस्त हैं ।

इन सबके बीच

फूलों को  फर्क नहीं पड़ता…

Continue

Added by नादिर ख़ान on October 12, 2012 at 4:00pm — 2 Comments

हमने शेरों को

हमने शेरों को ठिकाने दिये हैं
आज गीदड़ हमें डराने लगे हैं

जिनके हाथों में रहनुमाई दी थी
बस्तियाँ हमारी वो जलाने लगे हैं

जिन्हे धर्म का मतलब नहीं पता
लोग क़ाज़ी उन्हें बनाने लगे हैं

लूट-खसोट, धोखा जिनका ईमान
वो तहज़ीब हमको सिखाने लगे हैं 

जो आए तो थे ख़बर हमारी लेने
हौंसला देख ख़ुद लड़खड़ाने लगे हैं

Added by नादिर ख़ान on October 7, 2012 at 11:30pm — 10 Comments

ये परेशानियाँ तो आनी-जानी है

ये परेशानियाँ तो आनी-जानी है

मधुमेह तो कभी दिल की बीमारी है

 

गम है तो खुशी की वजहें भी हैं

रोते गुज़रे तो क्या जिंदगानी है

 

दिल के ज़ख़्मों से यूँ न घबराओ

बीते वक़्त की ये हसीं निशानी है

 

वक़्त बे वक़्त कुछ नहीं होता

जो मिला सब खुदा की मेहरबानी है

 

हर काम कल पर न छोड़ा करो

बर्बादिये वक़्त भी एक बीमारी है

 

गम की वजहें समझ नहीं आती

यही तो हमारी तुम्हारी कहानी है 

Added by नादिर ख़ान on October 4, 2012 at 6:32pm — 4 Comments

शर्मिंदा हूँ

मनाना तो चाहता हूँ ईद

मगर बंद है

मेरे दिल के दरवाज़े

और ईद का चाँद

मुझे दिखाई नहीं पड़ता

 

दिवाली,दशहरा कैसे मनाऊँ

मेरे अन्दर का रावण

नहीं मरता मुझसे

 

बापू की जयंती है

पर मै

उनसे भी शर्मिंदा हूँ  

मेरे अन्दर हिंसा है

लालच है

मै नहीं मिला पाता

अपनी नज़रें

उनकी तस्वीर से

 

जिन शहीदों ने

जान तक दे दी

हमारी आज़ादी के लिए

हमने उनका सब कुछ लूट…

Continue

Added by नादिर ख़ान on September 30, 2012 at 7:00pm — 5 Comments

ख़ुद अपनी आँच में

तुम जल रहे हो, हम जल रहे हैं

ख़ुद अपनी आँच में पिघल रहे हैं

 

नया  दौर  हैं नये हैं रस्मों-रिवाज़

अब इंसानियत के पैगाम बदल रहे हैं

 

बाज़ारों की रौनक है, जादू का खेल

किस…

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Added by नादिर ख़ान on September 28, 2012 at 4:00pm — 6 Comments

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