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Manan Kumar singh's Blog – December 2017 Archive (6)

विश्वसनीयता(लघु कथा)

मैं ,मैं हूँ।समझी ,कि नहीं?

-और मैं क्या हूँ,पता है?

-जरूर,पर हवाला मेरा ही दिया जाता है,तेरा नहीं।

-वो बात दीगर है।

-सच है।

-है,पर दिखने और होने में फर्क होता है।

-मतलब?

-तू समझता है।

-अरी, मेरे बिना तो सरकारें तक नहीं चलतीं, हिल जाती हैं।

-वही तो।तू पाला बदलता रहता है,मैं तिलमिलाती रहती हूँ।

-तो तुझे क्यों मलाल होता है?

-क्योंकि तू भौतिकता का कायल हो सकता है,हो भी जाता है।

-और तू?

-मैं तो भाव निरूपित करती हूँ।भाववाचक हूँ',विश्वसनीयता…

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Added by Manan Kumar singh on December 31, 2017 at 12:42pm — 8 Comments

गुस्सा(लघु कथा)


-बस जरा बर्त्तन पटक देती हूँ,वे समझ जाते हैं।
-कि तू गुस्से में है?
-और क्या?
-तू भी न।
-तू भी क्या री?रातभर जगाते हैं।बर्त्तन मेरे,सुबह मेरी।
-पर मेरा काम तो इस तरह पटकने-झटकने से नहीं चलता है न।
-क्यूँ?
-वो सुन नहीं सकते री।
-तो फिर?
-क्या करूँ,मुझे तो बेलन ही भाँजना पड़ता है।
-धत्त तेरी!
 "मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on December 27, 2017 at 10:04am — 12 Comments

डिग्री

कार्यकर्त्ता:मंत्रीजी से मिलना है।
पीए:नहीं मिल सकते।
कार्यकर्त्ता:क्यूँ?
पीए:माननीय अभी (......से ) बेगुनाही का प्रमाण पत्र खरीदने गये हैं।
का.:क्या?
पीए:अरे विरिधियों ने घोटाले में फँसा दिया है न।
का.:अच्छा्! तो डिग्री का मामला है।
"मौलिक      व  अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on December 25, 2017 at 12:47pm — 8 Comments

जीरो लॉस(लघु कथा)

'देख लूँगा स्साले को।'

-अरे क्या हुआ?कुछ बोलोगे भी?

-हम कालाबाजारी वाला केस जीत गये।

-बल्ले-बल्ले रे भइये।इ तो नच बलिये हो गवा।

-बाकिर वकीलवा पेंच फँसा रहल बा नु।

-उ का?

-उहे फ़ीस के लफड़ा।

-उ त सब फरिआइये गइल रहे।सात बरिस के फ़ीस एकमुश्ते देवे के रहे।

-हँ भाई, पूरे अठाईस गो सुनवाई भइल बा।

-त अठाइस हजार रुपिया भइल,आउर का?दियाई उनके।

-ना नु भाई,उ अब अबहीं के हिसाब से फ़ीस जोड़ ता। चार हजार रुपैया फी पेशी।

-बात त हजारे रुपया पेशी के भइल रहे।उ पगलाइल बा…

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Added by Manan Kumar singh on December 23, 2017 at 5:52am — 10 Comments

नकल (लघु कथा)

'उन्होंने एक लघु कथा लिखी।फेसबुक पर आ गयी।हठात उसपर मेरी नजर पड़ी। शीर्षक,समापन सब मेरे थे।बापू की मूर्त्ति के नीचे ही वार्त्तालाप हुआ था।मैं चकित था।सुबह मैंने लिखी,अपराह्न तक दोस्त ने दुहरा दी।बापू की जयकार बोलने का इससे बढ़िया दूसरा तरीका शायद ही हो।'---
मधुकर जी एक ही साँस में इतना सब कुछ बोल गए।…
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Added by Manan Kumar singh on December 17, 2017 at 8:00pm — 12 Comments

बापू की जय(लघु कथा)

-काम हो जायेगा?
-पक्का।
-कोई चूक न हो।
-नहीं होगी भइये।
-पिछली बार हो गयी थी।
-अबकी बार…
Continue

Added by Manan Kumar singh on December 10, 2017 at 11:52am — 19 Comments

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