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सतविन्द्र कुमार राणा's Blog – December 2016 Archive (5)

तरही गजल/सतविन्द्र कुमार राणा

2122 2122 212

बह रहे हो नद-से दम भर देखिये

चलते रहना पर ठहरकर देखिए।



राज दिल के मुँह पे लाकर देखिए

आज अपनों को बताकर देखिए।



जा रहे हो दूर हमसे रूठकर

थोड़ा-सा नजदीक आकर देखिये।



नफरतों से क्या किसी को कुछ मिला?

चाह दिल में भी जगाकर देखिये।



कुछ न हासिल हो सका चलके अलग

*दो कदम तो साथ चलकर देखिए।*



मुश्किलों में भी ख़ुशी को पा लिया

मिटता उनके दिल का हर डर देखिये



मुश्किलें होती हैं सच की राह… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 28, 2016 at 11:45am — 12 Comments

तरही गजल/सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र:22 22 22 22

चाहत यार बढाने निकले

दिलको आज कमाने निकले।



जिनको समझ रहे थे अपना

आज वही बेगाने निकले।



घर छोड़ा अपनों को छोड़ा

बन कर बस अनजाने निकले।



तनहा राहें अपनी साथी

हमसे दूर जमाने निकले।



लब पर ले मुस्कान बताओ

कैसा दर्द छुपाने निकले।





जिनको समझा सबने पागल

देखो यार सयाने निकले।



अपना आपा ठीक नहीं है

गैरों को समझाने निकले।



दर्द नया यूँ ही लगता है

लेकिन जख्म पुराने… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 15, 2016 at 4:30pm — 6 Comments

तरही गजल/राणा

बह्र 2122 2122 2122 212

गर मरे उम्मीद फिर कुछ भी यहां बचता नहीं

छोड़ दें उम्मीद को ये फैसला अच्छा नहीं।



गर्दिशों में जी रही आवाम सारी जब यहाँ

ऐश से तब हुक्मरां का टूटता नाता नहीं।



जिंदगी वो डोर है जिससे बँधा इंसान है

साथ उसका भी मगर होता हमेशा का नहीं।



मर मिटा है आज तू जिसकी हिफाज़त के लिए

बेवफा हमदम वो तेरी मौत पे आया नहीं।



कायदा-ए-जिंदगी भी है जरूरी दोस्तो

कायदे को छोड़ दें तो कुछ भी फिर जीना नहीं।



एक मुफ़लिस गर… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 7, 2016 at 7:09am — 6 Comments

सब्र है सबसे बड़ा जऱ दोस्तो(तरही ग़ज़ल)/सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र :2122 2122 212

---

उसने नगमा एक गाया देर तक

ऐसे ही हमको सुनाया देर तक।



सब्र है सबसे बड़ा जर दोस्तो

आलिमों ने यह सुझाया देर तक।



इश्क है वो रास्ता जो पाक है

सोच कर मन में बिठाया देर तक।



भाग उनके ही भले सब मानते

हो बड़ों का जिनपे साया देर तक।



भूख से तड़पा बहुत है यार वो

इसलिए उसने यूँ खाया देर तक।



भूलने की सोच कर आगे बढ़ा

भूल मैं उसको न पाया देर तक।



साथ चलने की कसम खाता रहा

आस में मुझको… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 4, 2016 at 6:30am — 15 Comments

गीत(रोला छ्न्द)/सतविन्द्र कुमार राणा

गीत (रोला छ्न्द)

-----

सबपर उसका नेह,प्रकृति प्यारी है माता

खिलता हरसिंगार,रात में सुन ले भ्राता।



पँखुड़ी निर्मल श्वेत,मोह सबका मन लेती

सुंदरता है नेक,नयन को यह सुख देती

केसरिया है दंड,रंग जिसका चमकीला

हुआ मुग्ध मन देख,प्रकृति की ऐसी लीला

पुलकित होकर आज ,हृदय इसके के गुण गाता

खिलता हरसिंगार रात में सुन ले भ्राता।



देखो ज्यों ही तात, प्रात की बेला आए

अवनी पर तब पुष्प,सभी जाते छितराए

सुन्दर हरसिंगार,उठालो इनको चुनकर

बनते… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 3, 2016 at 6:00pm — 9 Comments

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