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Kalipad Prasad Mandal's Blog – November 2017 Archive (6)

ग़ज़ल -क्या कहूँ उनकी नज़ाकत, जो दिवाना दिल में’ है--कालीपद 'प्रसाद'

काफिया  ;इल ; रदीफ़ : में है

बह्र : २१२२  २१२२  २१२२  २१२

क्या कहूँ उनकी नज़ाकत, जो दिवाने दिल में’ है

किन्तु का ज़िक्र दिल से दूगुना महफ़िल में’ है |१|

जानती है वह कि गलती की सही व्याख्या कहाँ

पंख बिन भरती उड़ाने, भूल इस गाफिल में’ है  |२|

राम रब कृष्ण और गुरु अल्लाह सब तो एक हैं

बोलकर नेता खुदा पर, पड़ गए मुश्किल में है |३|

गर सफलता चाहिए तुमको करो दृढ मन अभी

जज़्बा’ विद्यार्थी में’ हो वैसा…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on November 26, 2017 at 9:00am — 7 Comments

ग़ज़ल -राजाधिराज का गिरा’ दुर्जय कमान है-कालीपद 'प्रसाद'

काफिया : आन ,रदीफ़ : है

बह्र : २२१  २१२१  १२२१  २१२

राजाधिराज का गिरा’ दुर्जय कमान है

सब जान ले अभी यही’ विधि का विधान है |

अदभूत जीव जानवरों का जहान है

नीचे धरा, समीर परे आसमान है |

संसार में तमाम चलन है ते’री वजह

हर थरथरी निशान ते’री, तू ही’ जान है |

जो भी जमा किये यहाँ’ रह…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on November 20, 2017 at 3:37pm — 9 Comments

ग़ज़ल-चनावी दंगलों में स्याह धन की आजमाइश है- कालीपद 'प्रसाद'

काफिया : अन ; रफिफ ; की आजमाइश है

बहर : १२२२  १२२२  १२२२  १२२२

चनावी दंगलों में स्याह धन की आजमाइश है

इसी में रहनुमा के मन वचन की आजमाइश है |

सभी नेता किये दावा कि उनकी टोली’ जीतेगी   

अदालत में अभी तो अभिपतन की आजमाइश है |

खड़े हैं रहनुमा जनता के’ आँगन जोड़कर दो हाथ

चुने किसको, चुनावी अंजुमन की आजमाइश है |

लगे हैं आग भड़काने में’ स्वार्थी लोग दिन रात और

सरल मासूम जनता की सहन की आजमाइश है…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on November 14, 2017 at 7:30am — 8 Comments

ग़ज़ल -ये जिंदगी तो’ हो गयी’ दूभर कहे बगैर-कालीपद 'प्रसाद'

काफिया :अर ; रदीफ़ : कहे बगैर 

बह्र :२२१  २१२१  १२२१  २१२ (१)

ये जिंदगी तो’ हो गयी’ दूभर कहे बग़ैर 

आता सदा वही बुरा’ अवसर कहे बग़ैर |

बलमा नहीं गया कभी’ बाहर कहे बग़ैर

आता कभी नहीं यहाँ’, जाकर कहे बग़ैर |

है धर्म कर्म शील सभी व्यक्ति जागरूक

दिन रात परिक्रमा करे’ दिनकर कहे बग़ैर | 

दुर्बल के  क़र्ज़  मुक्ति  सभी होनी  चाहिए

क्यों ले ज़मीनदार सभी कर कहे बग़ैर |

सब धर्म पालते मे’रे’ साजन, मगर…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on November 9, 2017 at 9:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल-रहनुमा का’ मन काला, शक्ल पर उजाला है |

काफिया : आला . रदीफ़ : है

बह्र : २१२  १२२२  २१२  १२२२

हाथ में वही अंगूरी सुरा,पियाला है

रहनुमा का’ मन काला, शक्ल पर उजाला है |

छीन ली गई है आजीविका, दिवाला है

ढूंढ़ते रहे हैं सब, स्रोत को खँगाला है ||

आसमान पर जुगनू, चाँद सूर्य धरती पर

धर्म कर्म सब कुछ, भगवान का निराला है |

सब गड़े हुए मुर्दों को, उखाड़ते नेता

अब चुनाव क्या आया, भूत को उछाला है |

राज नीति में रिश्तेदार ही, अहम है सब

वो…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on November 6, 2017 at 7:30am — 2 Comments

गज़ल -अक्सीर दवा भी अभी’ नाकाम बहुत है

काफिया आम, रदीफ़ : बहुत है

बह्र : २२१  १२२१  १२२१  १२२ (१)

अकसीर  दवा भी अभी’ नाकाम बहुत है

बेहोश मुझे करने’ मय-ए-जाम बहुत है |

वादा किया’ देंगे सभी’ को घर, नहीं’ आशा

टूटी है’ कुटी पर मुझे’ आराम बहुत है |

प्रासाद विशाल और सुभीता सभी’ भरपूर   

इंसान हैं’ दागी सभी’, बदनाम बहुत हैं |

है राजनयिक दंड से’ ऊपर, यही’ अभिमान

शासन करे स्वीकार, कि इलज़ाम बहुत है |

साकी की’ इनायत क्या’ कहे,दिल का…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on November 2, 2017 at 8:24am — 2 Comments

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