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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – October 2013 Archive (1)

बुलाकर नेह को रखो

मिली जब से पनाहें सच, यहां इल्जाम को घर में

लिए बदनामी संग फिरते, छुपाकर नाम को घर में



बुलाकर नेह को रखो, यहां सम्मान से तुम नित  

मगर भूले से भी मत देना, “शरण काम को घर में



निपट लेगा फिर वन में, अकेली ताड़का से तो वो

यहां सौ-सौ लंकेश  बैठे हैं, बुलाओ राम को घर में



सुना है सबसे रखवाया, वचन बेटी की इज्जत का

मगर बोलो कि कब दोगे, इसी अंजाम को घर में



अभी तो साथ चलनी है, कर्ज में लिपटी हुर्इ सुबहें

भला फिर कैसे रोकें हम, धुआंती…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 5, 2013 at 6:00am — 7 Comments

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