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Alok Mittal's Blog – October 2014 Archive (4)

मैं नदी हूँ

क्योकि में इक नदी हूँ

मेरा कोई दोष नहीं

फिर भी मैं दोषी हूँ

करते तुम सब लोग हो

भरती मैं हूँ ..

क्योकि में इक नदी हूँ

मुझमे भी जीवन है

मेरा भी  अस्तित्व है

मेरी एक पहचान है

जो लोग करते पूजा हैं  

वही गंदगी भी देते हैं  

चुपचाप सब सहती हूँ

क्या करूँ मैं इक नदी हूँ ...

जागो अब भी जागो

विलुप्त हो जाऊ उस से

पहले मुझे बचा लो

नहीं तो रह जाओगे प्यासे

जैसे बीन पानी मछली तरसे ,

जाने कितने दोहन हुए…

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Added by Alok Mittal on October 29, 2014 at 6:00pm — 10 Comments

एक कप चाय (लघुकथा)

"यार एक कप चाय मिल जाती तो मजा आ जाता I"  

पतिदेव का हुक्म सुन घर की साफ़ सफाई करके थकी हारी पत्नी रसोईघर की तरफ मुड़ गयी.

साहब सोफे पर बैठ कर टीवी ऑन कर मजे से चैनल बदलते हुए कह रहे थे:

"आज तो यार बहुत थक गए, दीपावली पर बाज़ार जाना, उफ्फ्फ्फ़ ...."

पति की हां में हां मिलाते हुए पत्नी चाय देकर वापिस मुड़ गई और अपने काम में लग गयी !

"मौलिक व अप्रकाशित"…

Continue

Added by Alok Mittal on October 25, 2014 at 11:30pm — 17 Comments

दिये (लघुकथा)

ये दिये क्या भाव हैं अम्मा ?" गाडी में बैठी सभ्रांत महिला ने दीपक बेचने वाली बुढ़िया से पूछा I  
"50 रुपये के 100 हैं बिटिया I" बुढ़िया ने उत्तर दिया I
"हे भगवान् ! इतने महेंगे ? अम्मा तुम तो लूट रही हो I"
"एक बात का जवाब दो बेटी, ये महंगाई क्या सिर्फ अमीरों के लिए ही है, हम गरीबों के लिए नहीं ?"

मौलिक एवं अप्रकाशित

आलोक मित्तल

मथुरा

Added by Alok Mittal on October 22, 2014 at 12:00pm — 9 Comments

वो पल **

वाहनों से भरी सडक पर एक बाबा पैदल चले जा रहा था .. उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था की वो थक गया है और सहायता  चाहता है , थके होने की वजह से वो बार बार मुड के पीछे देख रहा था ! 

आगे का रास्ता किसी वाहन पर करने की उम्मीद लिए जिसको भी हाथ देता वो उसको अनदेखा कर आगे निकल जाता ..मायूसी चेहरे पर थी पर  बिना रुके चल भी रहा था ...

इस आपा धापी की जिंदगी में सबको जल्दी है पर कुछ दूर अगर छोड़ा जाता तो कुछ जाता नहीं उल्टा हमें जो आशीर्वाद मिलता वो जरूर फलता....जो शायद मेरे भाग्य में…

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Added by Alok Mittal on October 14, 2014 at 6:00pm — 7 Comments

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