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गिरिराज भंडारी's Blog – September 2017 Archive (3)

तरही ग़ज़ल - "ये वो क़िस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ ‘ ( गिरिराज भंडारी )

2122/1122   1122  1122   22 /112

जीभ ख़ुद की है तो दांतों से दबा भी न सकूँ

कैसे खामोश रहे इस को सिखा भी न सकूँ 

 

उनका वादा है कि ख़्वाबों में मिलेंगे मुझसे

मुंतज़िर चश्म को अफसोस सुला भी न सकूँ

 

तश्नगी देख मेरी आज समन्दर ने कहा

कितना बदबख़्त हूँ मैं प्यास बुझा भी न सकूँ



मेरे रस्ते में जो रखना तो यूँ पत्थर रखना

कोशिशें लाख करूँ यार हिला भी न सकूँ 

 

यहाँ तो सिर्फ अँधेरों के तरफदार बचे

छिपा रक्खा है,…

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Added by गिरिराज भंडारी on September 27, 2017 at 9:00am — 31 Comments

ग़ज़ल - दो पहर की धूप भी अच्छी लगी ( गिरिराज भंडारी )

2122    2122    212

दो पहर की धूप भी अच्छी लगी

साथ उनके हर कमी अच्छी लगी

 

यादों की थीं खुश्बुयें फैलीं वहाँ

तुम न थे फिर भी गली अच्छी लगी

 

कब कहा मैनें कि मैं था शादमाँ

कुल मिला कर ज़िन्दगी अच्छी लगी

 

सब में रहता है ख़ुदा ये मान कर

जब भी की तो बन्दगी अच्छी लगी

हाँ, ज़बाँ से भी कहा था कुछ मगर  

जो नज़र ने थी कही, अच्छी लगी

 

दोस्ती तो थी हमारी नाम की  

पर तुम्हारी दुश्मनी,…

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Added by गिरिराज भंडारी on September 18, 2017 at 3:30pm — 17 Comments

ग़ज़ल - मैं उसकी ताब से खो कर हवास बैठा था ( गिरिराज भंडारी )

1212   1122   1212   22  

नहीं ये ठीक, मैं तन्हा उदास बैठा था

मैं उसकी ताब से खो कर हवास बैठा था

                                                                                    

नज़र उठा के तेरी सिम्त कैसे करता मैं

नज़र से चल के कोई दिल के पास बैठा था

 

कहीं नदी की रवानी थमी थी पत्थर से

कहीं लिये कोई सदियों की प्यास बैठा था

 

है मोजिज़ा कि ख़ुदा का करम बहा मुझ पर   

वो तर बतर हुआ जो मेरे पास बैठा…

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Added by गिरिराज भंडारी on September 16, 2017 at 8:00am — 29 Comments

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