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Sanjiv verma 'salil''s Blog – September 2010 Archive (16)

लोकगीत:पोछो हमारी कार..... संजीव 'सलिल'

लोकगीत:



पोछो हमारी कार.....



संजीव 'सलिल'

*

ड्राइव पे तोहे लै जाऊँ, ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.

पोछो न हमरी कार, ओ बलमा! पोछो न हमरी कार.....

*

नाज़ुक-नाज़ुक मोरी कलाई,

गोरी काया मक्खन-मलाई.

तुम कागा से सुघड़, कहे जग-

'बिजुरी-मेघ' पुकार..

ओ सैयां! पोछो हमारी कार.

पोछो न हमरी कार, ओ बलमा! पोछो न हमरी कार.....

*

संग चलेंगी मोरी गुइयां,

तनक न हेरो बिनको सैयां.

भरमाये तो कहूँ राम सौं-

गलन ना दइहों… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 29, 2010 at 7:00pm — 2 Comments

हास्य कविता: कान बनाम नाक --संजीव 'सलिल'

हास्य कविता:



कान बनाम नाक



संजीव 'सलिल'

*

शिक्षक खींचे छात्र के साधिकार क्यों कान?

कहा नाक ने- 'मानते क्यों अछूत श्रीमान?

क्यों अछूत श्रीमान, न क्यों कर मुझे खींचते?

क्यों कानों को लाड़-क्रोध से आप मींचते??



शिक्षक बोला- "छात्र की अगर खींच दूँ नाक,

कौन करेगा साफ़ यदि बह आयेगी नाक?

बह आयेगी नाक, नाक पर मक्खी बैठे.

ऊँची नाक हुई नीची, तो हुए फजीते..



नाक एक है कान दो, बहुमत का है राज.

जिसकी संख्या अधिक हो, सजे शीश… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 28, 2010 at 10:30am — 1 Comment

चंद अश'आर: तितलियाँ --- संजीव 'सलिल'

चंद अश'आर:



तितलियाँ



--- संजीव 'सलिल'



*



तितलियाँ जां निसार कर देंगीं.

हम चराग-ए-रौशनी तो बन जाएँ..

*

तितलियों की चाह में दौड़ो न तुम.

फूल बन महको तो खुद आयेंगी ये..

*

तितलियों को देख भँवरे ने कहा.

'भटकतीं दर-दर न क्यों एक घर किया'?

*

कहा तितली ने 'मिले सब दिल जले.

कोई न ऐसा जहाँ जा दिल खिले'..

*

पिता के आँगन में खेलीं तितलियाँ.

गयीं तो बगिया उजड़ सूनी हुई..

*

बागवां के गले लगकर… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 25, 2010 at 10:00pm — 3 Comments

नवगीत : बरसो राम धड़ाके से.... संजीव 'सलिल'

नवगीत:



बरसो राम धड़ाके से



संजीव 'सलिल'

*

*

बरसो राम धड़ाके से !

मरे न दुनिया फाके से !



लोकतंत्र की

जमीं पर, लोभतंत्र के पैर

अंगद जैसे जम गए अब कैसे हो खैर?

अपनेपन की आड़ ले, भुना

रहे हैं बैर

देश पड़ोसी मगर बन- कहें मछरिया तैर

मारो इन्हें कड़ाके से, बरसो राम

धड़ाके से !

मरे न दुनिया फाके से !



कर विनाश

मिल, कह रहे, बेहद हुआ विकास

तम की कर आराधना- उल्लू कहें उजास

भाँग कुएँ में घोलकर,… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 25, 2010 at 10:30am — 7 Comments

लेख : हिंदी की प्रासंगिकता और हम. --संजीव वर्मा 'सलिल'

लेख :



हिंदी की प्रासंगिकता और हम.



संजीव वर्मा 'सलिल'



हिंदी जनवाणी तो हमेशा से है...समय इसे जगवाणी बनाता जा रहा है. जैसे-जिसे भारतीय विश्व में फ़ैल रहे हैं वे अधकचरी ही सही हिन्दी भी ले जा रहे हैं. हिंदी में संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, उर्दू , अन्य देशज भाषाओँ या अंगरेजी शब्दों के सम्मिश्रण से घबराने के स्थान पर उन्हें आत्मसात करना होगा ताकि हिंदी हर भाव और अर्थ को अभिव्यक्त कर सके. 'हॉस्पिटल' को 'अस्पताल' बनाकर आत्मसात करने से भाषा असमृद्ध होती है किन्तु 'फ्रीडम' को… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 22, 2010 at 6:30pm — 5 Comments

समीक्षात्मक आलेख : डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में अलंकारिक सौंदर्य

समीक्षात्मक आलेख:



डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में अलंकारिक सौंदर्य







रचनाकार:आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'



जगवाणी हिंदी को माँ वीणापाणी के सितार के तारों से झंकृत विविध रागों से उद्भूत सांस्कृत छांदस विरासत से समृद्ध होने का अनूठा सौभाग्य मिला है. संस्कृत साहित्य की सरस विरासत को हिंदी ने न केवल आत्मसात किया अपितु पल्लवित-पुष्पित भी किया. हिंदी सहित्योद्यान के गीत-वृक्ष पर झूमते-झूलते सुन्दर-सुरभिमय अगणित पुष्पों में अपनी पृथक पहचान और ख्याति से संपन्न डॉ.… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 22, 2010 at 9:30am — No Comments

त्रिपदिक कविता : प्रात की बात -----संजीव 'सलिल'

त्रिपदिक कविता :



प्रात की बात



संजीव 'सलिल'

*

सूर्य रश्मियाँ

अलस सवेरे आ

नर्तित हुईं.

*

शयन कक्ष

आलोकित कर वे

कहतीं- 'जागो'.

*

कुसुम कली

लाई है परिमल

तुम क्यों सोये?

*

हूँ अवाक मैं

सृष्टि नई लगती

अब मुझको.

*

ताक-झाँक से

कुछ आह्ट हुई,

चाय आ गयी.

*

चुस्की लेकर

ख़बर चटपटी

पढ़ूँ, कहाँ-क्या?

*

अघट घटा

या अनहोनी हुई?

बासी… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 22, 2010 at 8:00am — 2 Comments

मुक्तिका सत्य संजीव 'सलिल'

सत्य



संजीव 'सलिल'

*

सत्य- कहता नहीं, सत्य- सुनता नहीं?

सरफिरा है मनुज, सत्य- गुनता नहीं..

*

ज़िंदगी में तुम्हारी कमी रह गयी.

सिर्फ कहता रहा, सत्य- चुनता नहीं..

*

आह पर वाह की, किन्तु करता नहीं.

दाना नादान है, सत्य- धुनता नहीं..

*

चरखा-कोशिश परिश्रम रुई साथ ले-

कातता है समय, सत्य- बुनता नहीं..

*

नष्ट पल में हुआ, भ्रष्ट भी कर गया.

कष्ट देता असत, सत्य- घुनता नहीं..

*

प्यास हर आस दे, त्रास सहकर… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 17, 2010 at 10:30pm — 2 Comments

दोहा सलिला: नैन अबोले बोलते..... संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:



नैन अबोले बोलते.....



संजीव 'सलिल'

*

*

नैन अबोले बोलते, नैन समझते बात.

नैन राज सब खोलते, कैसी बीती रात.

*

नैन नैन से मिल झुके, उठे लड़े झुक मौन.

क्या अनकहनी कह गए, कहे-बताये कौन?.

*

नैन नैन में बस हुलस, नैन चुराते नैन.

नैन नैन को चुभ रहे, नैन बन गए बैन..

*

नैन बने दर्पण कभी, नैन नैन का बिम्ब.

नैन अदेखे देखते, नैनों का प्रतिबिम्ब..

*

गहरे नीले नैन क्यों, उषा गाल सम लाल?

नेह नर्मदा… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 17, 2010 at 6:30pm — 4 Comments

अभियंता दिवस पर मुक्तिका: हम अभियंता --अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल'

अभियंता दिवस पर मुक्तिका:



हम अभियंता



अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल'

*

कंकर को शंकर करते हैं हम अभियंता.

पग-पग चल मंजिल वरते हैं हम अभियंता..



पग तल रौंदे जाते हैं जो माटी-पत्थर.

उनसे ताजमहल गढ़ते हैं हम अभियंता..



मन्दिर, मस्जिद, गिरजा, मठ, आश्रम तुम जाओ.

कार्यस्थल की पूजा करते हम अभियंता..



टन-टन घंटी बजा-बजा जग करे आरती.

श्रम का मन्त्र, न दूजा पढ़ते हम अभियंता..



भारत माँ को पूजें हम नव निर्माणों… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 16, 2010 at 10:17am — 5 Comments

तरही मुक्तिका:: कहीं निगाह... संजीव 'सलिल'

आत्मीय!

यह मुक्तिका १०.९.१० को भेजी थी. दी गयी पंक्ति न होने से सम्मिलित नहीं की गयी. संशोधन सहित पुनः प्रेषित.



तरही मुक्तिका::



कहीं निगाह...

संजीव 'सलिल'

*

कदम तले जिन्हें दिल रौंद मुस्कुराना है.

उन्ही के कदमों में ही जा गिरा जमाना है



कहीं निगाह सनम और कहीं निशाना है.

हज़ार झूठ सही, प्यार का फसाना है..



न बाप-माँ की है चिंता, न भाइयों का डर.

करो सलाम ससुर को, वो मालखाना है..



पड़े जो काम तो तू बाप गधे को कह… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 16, 2010 at 9:19am — 10 Comments

नवगीत: अपना हर पल है हिन्दीमय... --संजीव वर्मा 'सलिल'

नवगीत:

संजीव 'सलिल'

*

*

अपना हर पल

है हिन्दीमय

एक दिवस

क्या खाक मनाएँ?



बोलें-लिखें

नित्य अंग्रेजी

जो वे

एक दिवस जय गाएँ...



*



निज भाषा को

कहते पिछडी.

पर भाषा

उन्नत बतलाते.



घरवाली से

आँख फेरकर

देख पडोसन को

ललचाते.



ऐसों की

जमात में बोलो,

हम कैसे

शामिल हो जाएँ?...



हिंदी है

दासों की बोली,

अंग्रेजी शासक

की… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 15, 2010 at 7:54am — 3 Comments

तीन पद: संजीव 'सलिल'

तीन पद:

संजीव 'सलिल'

*

धर्म की, कर्म की भूमि है भारत,

नेह निबाहिबो हिरदै को भात है.

रंगी तिरंगी पताका मनोहर-

फर-फर अम्बर में फहरात है.

चाँदी सी चमचम रेवा है करधन,

शीश मुकुट नगराज सुहात है.

पाँव पखारे 'सलिल' रत्नाकर,

रवि, ससि, तारे, शोभा बढ़ात है..

*

नीम बिराजी हैं माता भवानी,

बंसी लै कान्हा कदम्ब की छैयां.

संकर बेल के पत्र बिराजे,

तुलसी में सालिगराम रमैया.

सदा सुहागन अँगना की सोभा-

चम्पा, चमेली, जुही में… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 13, 2010 at 11:33pm — 3 Comments

भजन : एकदन्त गजवदन विनायक ..... संजीव 'सलिल'

भजन :



एकदन्त गजवदन विनायक .....



संजीव 'सलिल'

*

*

एकदन्त गजवदन विनायक, वन्दन बारम्बार.

तिमिर हरो प्रभु!, दो उजास शुभ, विनय करो स्वीकार..

*

प्रभु गणेश की करो आरती, भक्ति सहित गुण गाओ रे!

रिद्धि-सिद्धि का पूजनकर, जन-जीवन सफल बनाओ रे!...

*

प्रभु गणपति हैं विघ्न-विनाशक,

बुद्धिप्रदाता शुभ फलदायक.

कंकर को शंकर कर देते-

वर देते जो जिसके लायक.

भक्ति-शक्ति वर, मुक्ति-युक्ति-पथ-पर पग धर तर जाओ रे!...

प्रभु गणेश की… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 11, 2010 at 9:09am — 2 Comments

मुक्तिका: चुप रहो... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:



चुप रहो...



संजीव 'सलिल'

*

महानगरों में हुआ नीलाम होरी चुप रहो.

गुम हुई कल रात थाने गयी छोरी चुप रहो..



टंग गया सूली पे ईमां मौन है इंसान हर.

बेईमानी ने अकड़ मूंछें मरोड़ी चुप रहो..



टोफियों की चाह में है बाँवरी चौपाल अब.

सिसकती कदमों तले अमिया-निम्बोरी चुप रहो..



सियासत की सड़क काली हो रही मजबूत है.

उखड़ती है डगर सेवा की निगोड़ी चुप रहो..



बचा रखना है अगर किस्सा-ए-बाबा भारती.

खड़कसिंह ले… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 4, 2010 at 8:30am — 5 Comments

बाल गीत: लंगडी खेलें..... -संजीव 'सलिल'

*

बाल गीत:



लंगडी खेलें.....



आचार्य संजीव 'सलिल'

*

आओ! हम मिल

लंगडी खेलें.....

*

एक पैर लें

जमा जमीं पर।

रखें दूसरा

थोडा ऊपर।

बना संतुलन

निज शरीर का-

आउट कर दें

तुमको छूकर।

एक दिशा में

तुम्हें धकेलें।

आओ! हम मिल

लंगडी खेलें.....

*

आगे जो भी

दौड़ लगाये।

कोशिश यही

हाथ वह आये।

बचकर दूर न

जाने पाए-

चाहे कितना

भी भरमाये।

हम भी चुप रह

करें… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 1, 2010 at 10:18pm — 6 Comments

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