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बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog – September 2017 Archive (3)

ग़ज़ल....कितने घावों को सिल डाला शब्दों के पैबंदों से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

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भावों के धागे चुन चुन कर अरमानों के बंधों से

कितने घावों को सिल डाला शब्दों के पैबंदों से



साँसों से जीवन जैसा फूलों से तितली का रिश्ता

कुछ ऐसा ही नाता अपना कविता गीतों छंदों से



जन्मों जन्मों का बंधन है डरना क्या इनसे बन्धू

दुख चलते हैं बनके साथी इनसे हैं अनुबंधों से



अक्सर सच की नीलामी भी चौराहों पे होती है

उसकी हालत बद से बदतर लूले बहरे अंधों से



मजहब को जीने वाले वो मजहब को ही खाते हैं

कोने में… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 29, 2017 at 5:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल....धीरे धीरे रीत गया - बृजेश कुमार 'ब्रज'

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यादों के गलियारे होकर जब मैं आज अतीत गया

लाख सँभाला आँखों ने पर धीरे धीरे रीत गया



नाम पुकारा कुछ ने मेरा कुछ के अश्क़ छलक आये

कुछ तस्वीरें मुस्काईं तो गूँज कहीं संगीत गया



ख्वाब सुहाने कुछ बचपन के टूट गये कुछ रूठ गये

कैसे जी को समझाऊँ मैं क्या गुजरी क्या बीत गया



ऐसा क्या माँगा था उनसे ऐसी क्या मज़बूरी थी

बीच भँवर क्यों हाथ छुड़ाकर बेदर्दी मनमीत गया



खेल रचा क्या भावों का हाथों की चन्द लकीरों ने

हार गया… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 16, 2017 at 8:25pm — 27 Comments

गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल..मेरे दीदा ए नम में तू ही तू-बृजेश कुमार 'ब्रज'

गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल
2122 1212 22
तेरी आँखें ज़हान की खुशबू
मेरे दीदा ए नम में तू ही तू

गीत ग़ज़लों में तू नुमायाँ है
तेरा ही चर्चा नज़्म में हर सू

याद किसकी शुरुर है किसका
किसलिये आँखों से रवां आँसू

तेरी जुल्फों की खुशबुएँ लेकर
कोई झोंका सबा का जाये छू

धर्म मजहब से ये हुआ हासिल
जल रहे हैं बशर यहाँ धू धु

राज है 'ब्रज' तेरी उदासी में
बेसबब आज फिर बहे आँसू
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 6, 2017 at 3:00pm — 2 Comments

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