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Kishorekant's Blog – August 2018 Archive (5)

मौन

मौन

मौन में शाश्वत सुख है, शब्द में आक्रन्द है

शब्द नहीं अनिवार्य होते दो दिलों की चाह में

सब समझ लेते हैं प्रेमी सिर्फ़ अपनी आह मे

मन से मन का मेल है तो नीरवता भी छंद है

मौन मेंशाश्वत..........

शब्द की तो एक सीमा,अविरत होता मौन है

शब्द के तो बाण होते मौन कितना सौम्य है

मौन में तो सहजता है, शब्द में पाखंड है

मौन में शाश्वत ...........

क्या कहुँ,कितना कहुँ,किसको कदुँ क्योंकर कहुँ

सच्चा कहुँ,मिथ्या कहुँ,मैं ये कहुँ या वो कहुँ…

Continue

Added by Kishorekant on August 7, 2018 at 6:12pm — 4 Comments

ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश

ये हवा कैसी चली है आजकल

सब यहाँ दिखते दुखी हैं आजकल

दुख किसीको है अकेला क्यों खड़ा

और किसीको भीड का ग़म आजकल

है शिकायत नौजवाँ को बाप से

बाप को लगता वो बिगड़ा आजकल

मायने हर चीज के बदले यहाँ

है नहीं अच्छा बुरा कुछ आजकल

बाँटकर खाने के दिन वो लद गये

लूटलो जितना सको बस आजकल

मुल्क के ख़ातिर गँवाते जान थे

क़त्ल करते मुल्कमें ही आजकल

क़ौल के ख़ातिर गँवायें जान…

Continue

Added by Kishorekant on August 5, 2018 at 9:30pm — 9 Comments

ग़ज़ल

1222,1222, 1222, 1222

चलो ये बोझ भी दिलपर उठाकर देख लेते हैं

किसीको हम ज़रा दिलमें बसाकर देख लेते हैं

जियेगें किस तरह तन्हाँ यहाँ साथी अगर छूटा

यहाँ जो बेवजह रूठा मनाकर देख लेते हैं .....

कहाँतक हार है अपनी ज़रा इसका पता करलें

यहाँ भी ईक नयी बाज़ी लगाकर देख लेते है....

कहो कैसे यक़ीं तुमको दिलायें आशनाई का.

लगेहैं जख्म जो दिल पर दिखाकर देख लेते हैं

जमींपर जो नहीं मिलते वो मिलते आसमानों पर

चलो…

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Added by Kishorekant on August 4, 2018 at 5:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल

हमें ख़ुशियाँ नहीं क्यों ग़म मिला है
नहीं माँगा वही हरदम मिला है

अधूरी चाहतें लेकर जिये हैं
हमेशा चाहतोंसे कम मिला है

नहीं फ़रियाद बस सजदे किये हैं
कहो जन्नतमें’ क्यों मातम मिला है

सफ़र कांटोभरा क्या कम नहीं था
हमें बेज़ार क्यों मौसम मिला है

मनानेके सभी फ़न बेअसर हैं
बड़ा ही संगदिल हमदम मिला है


१२२२,१२२२,१२२ “अम” मिला है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Kishorekant on August 2, 2018 at 7:12pm — 1 Comment

नारी

​​​​​नारी

सबकुछ है नारीमें लेकिन एक कमी रहजाती है

उसकी सारी खूबियाँ केवल आँसूमें बहजाती है



वज्र के जैसा सीना उसका, अमीधार छलकाती है

सन्तानों के पालनमें ही,

अपना आप खपाती है

उससे ही परिवार पूर्ण फिर,आधी क्यों कहलाती है

सबकुछ है नारीमे लेकिन, एक कमी रहजाती है



हँसती है जब रोना होता, मौन रहे जब कहेना होता

परिणाम सबकी भूलोंका उसको ही क्यों सहेना होता

झूठी इक मुस्कान बस उसकी भेद सभी कहजाती है

सबकुछ है नारीमे लेकिन एक कमी रहजाती…

Continue

Added by Kishorekant on August 1, 2018 at 7:11pm — 4 Comments

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