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Kanta roy's Blog – July 2015 Archive (10)

आसमान को नापना ही होगा // कान्ता राॅय

जागी थी आज मै

चौंक उठी थी सहसा

कई कामों के संग ही

एक काम और रह गया



बहुत दिन हुए सोचे

आसमान नाप कर देखू

सुना है नील गगन

यह अति अनंत है

लेकिन अनंत में भी तो

छुपा हुआ होता एक अंत है



कहते है , किसी ने ना किया जो

मै बावरी भी ,ना करूं वो

छोड़ दू जिद

हो सकता है

कोई ना कर पाया जो

मै ही कर बैठू वो

क्यों बिना किये ऐसे छोड़ दू ,

अपने मंजिल का रास्ता मोड़ दू



उठा कर इंजी टेप मैने

पूरे होशोहवास… Continue

Added by kanta roy on July 25, 2015 at 12:06am — 5 Comments

दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ /कान्ता राॅय

धूमिल होती भ्रांति सारी, गण-गणित मैं तोड़ रही हूँ

कलम डुबो कर नव दवात में, रूख समय का मोड़ रही हूँ

                          मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ ......

नई भोर की चादर फैली, जन-जीवन झकझोर रही हूँ

धधक रही संग्राम की ज्वाला, सागर सी हिल-होर रही हूँ

                              मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ ......

टूटे हृदय के कण-कण सारे, चुन-चुन सारे जोड़ रही हूँ

उद्वेलित मन अब सम्भारी, विषय-जगत अब छोड़ रही…

Continue

Added by kanta roy on July 24, 2015 at 9:30am — 36 Comments

छुटकारा / लघुकथा /कान्ता राॅय

बरसों से पति का शराब पीकर मारने की आदत सह रही थी वो , लेकिन कल रात उसका पीकर आने के बाद बेटी का हाथ पकडना अखर गया था ।

सुबह अंगीठी के साथ वह भी सुलगती रही.  क्षोभ , घृणा , मोह और कुंठाओं को सिलबट्टे पर बरसों से संचित आँखों का नमकीन पानी डाल - डाल कर जोर - जोर से पीसती जा रही थी । आज वह कुछ तय कर बैठी थी ।


कान्ता राॅय
भोपाल
मौलिक और अप्रकाशित

Added by kanta roy on July 14, 2015 at 11:00pm — 4 Comments

दिल आज उदास है // कान्ता राॅय

आईये पास कि दिल आज उदास है

आपकी आस में दिल आज उदास है



याद का भँवर उडा ले चला इस कदर

थाम लीजिए मुझे दिल आज उदास है





हाथ में आपकी हैं छुअन सी लगीं

घटा को देख फिर दिल आज उदास है





दिल का धडक जाना आपके नाम से

बदलियों को देख दिल आज उदास है





छतरी में सिमटना एक ठंडी शाम में

यादों में तनहा दिल आज उदास है



रूहानी तलाश रूह की जैसी प्यास

ढुंढना आस पास दिल आज उदास है



पूछना मुझसे नाम मेरे यार… Continue

Added by kanta roy on July 13, 2015 at 1:30pm — 18 Comments

सनकी ( लघुकथा )

विदेशी कुर्सी,दुनिया की नम्बर एक साॅफ्टवेयर कम्पनी , लाखों का पैकेज। ....लेकिन मन...? एक बंधन सदा मन को जकड़े रहता था । कितने वेब डिजाइन किए।पर प्रोजेक्ट की सफलता खुशी कहाँ दे पाती थी ।



देश के प्रति जिम्मेदारी ....

वतन की मिट्टी की पुकार ,अपने बन्धन में जकड़ रही थी ।



उसके भारतीय सहकर्मी भी विदेशी नीति से संतुष्ट नहीं थे ।



गिरीश के नेतृत्व में जब उनलोगो ने लाखों के पैकेज वाली नौकरी से इस्तीफ़ा दिया तो सहयोगियों ने उन्हें " सनकी " की उपाधि से नवाज़ा… Continue

Added by kanta roy on July 12, 2015 at 1:33pm — 10 Comments

प्रेम की भाषा (लघुकथा )

रोज सुबह की सैर समंदर के किनारे , विकास का बरसों का सिलसिला रहा है । लेकिन पिछले कुछ दिनों से एक बच्चा रोज उसके पास सुबह - सुबह आकर खड़ा हो जाता है ।



पहले दिन ही विकास की नजर नें उसके आँखों में उसके पेट की भूख को देख लिया था , सो दस रूपये का बिस्कुट एक हाॅकर से लेकर उसे दे दिया ।



वो अब रोज ही अपनी उन भूखी आँखों के साथ विकास के पास आकर खड़ा हो जाता था । विकास भी अब उसके लिए एक बिस्कुट का पैकेट का इंतजाम करके रखता ही था । उसके आँखों में भूख देखना उसे बिलकुल अच्छा नही लगता है… Continue

Added by kanta roy on July 11, 2015 at 9:00am — 4 Comments

हवन और दानव ( लघुकथा )

अनुष्ठान में पंडितों का जमावड़ा , हवन और मंत्रों के जाप से सम्पूर्ण वातावरण पवित्र और सुवासित हो उठा था । प्राँगण में महिलाओं का समूह बैठकर बडे उत्साह से ढोल मंजीरे लिये भजन गा रहा था । 

एक पंडित ने अनुष्ठान के आमदनी पर सवाल उठाये कि मंदिर कार्यकर्ताओं में खलबली मच गई ।
पल भर में ही देव सारे विलुप्त हो गये अनुष्ठान में सिर्फ दानवों का अधिपत्य हो गया ।



कान्ता राॅय
भोपाल
मौलिक और अप्रकाशित

Added by kanta roy on July 7, 2015 at 9:30pm — 10 Comments

महंगी मुस्कान (लघुकथा )

महंगी मुस्कान ( लघुकथा )









" मुस्कान का व्यापारी हूँ । मुस्कान ही बेचता हूँ । कई प्रकार की मुस्कान है मेरे पास । "



" ये क्या बात हुई भला ..!!! मुस्कान का भी कोई व्यापार होता है ! "



" होता है बाबू , आजकल मुस्कान भी बिकती है । .... मुस्कान बडी ही महंगी चीज़ होती है । "



" अच्छा !! दिखाओ तो भला ... कितने प्रकार की मुस्कान है तुम्हारे पास ..??? "



" पहले जेब से पैसा निकालो , तुम्हारा जेब ही तय करेगा कि तुम पर कौन सा मुस्कान सुट… Continue

Added by kanta roy on July 5, 2015 at 9:35pm — 13 Comments

आस का सुर्योदय (लघुकथा ) कान्ता राॅय

आस का सुर्योदय ( लघुकथा )





सर पर लकड़ी का गठ्ठर , पसीने से तर- बतर वो घर की ओर चली आ रही थी । माई का डर मन ही मन सता रहा था उसे । कल रात ही माई ने बोल दिया था कि ,



"चुल्हा चौका और घर का काम करके अगर समय मिले तो ही पढना छोरी ! "

माई भी क्या करें .. खेत पर बापू के संग काम पर जाना जो होता है !



आज सुबह सीतो अखबार लेकर आ गई थी ।



" देख तु जिले में प्रथम स्थान पर आई है ! " -- सीतो ने जैसे ही कहा , सुनते ही उसके खुशी से पैर , बदन सब काँप उठे थे… Continue

Added by kanta roy on July 4, 2015 at 1:08pm — 16 Comments

ब्राँडेड मवाली ( लघुकथा ) कान्ता राॅय

ब्राँडेड मवाली ( लघुकथा )





" कितनी अचरज की बात थी कि वो बाई होकर ख्वाब देख रही है । "



" तुम्हें क्या लगता है कि बाई को स्वप्न नहीं देखना चाहिए ...!!"



" स्वप्न देखने का आधार भी तो होना चाहिए । आपने देखा नहीं कि वो दो बार दसवीं में फेल होकर बडी मुश्किल से बारहवीं में सप्लीमेंटरी से पास हुआ है और वो है कि बेटे को इंजीनियर बनाने की बात कर रही थी ।इधर बेटा सड़कों पर मवालीगिरी करता फिरता है और उधर माँ के स्वप्न.. हुँह !!! "



" यही मवाली तो पढ लिख कर… Continue

Added by kanta roy on July 2, 2015 at 2:30pm — 10 Comments

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