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Babitagupta's Blog – June 2018 Archive (4)

वरखा बहार आई........[तुकांत-अतुकांत कविता]

घुमड़-घुमड़ बदरा छाये,

चम-चम चमकी बिजुरियां,छाई घनघोर काली घटाएं,

घरड-घरड मेघा बरसे,

लगी सावन की झड़ी,करती स्वागत सरसराती हवाएं........

लो,सुनो भई,बरखा बहार आई......

तपती धरती हुई लबालव,

माटी की सौंधी खुश्बू,प्रफुल्लित बसुन्धरा से संदेश कहती,

संगीत छेड़ती बूंदों की टप-टप ,

लहराते तरू,चहचहाते विहग,कोयल मधुर गान छेड़ती.......

लो सुनो भई,वरखा बहार आई.......

छटा बिखर गई,मयूर थिरक उठा-सा,

सुनने मिली झींगरों की झुनझुनी,पपीहे…

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Added by babitagupta on June 28, 2018 at 8:30pm — 9 Comments

मन का भंवर ...

    अकस्मात मीनू के जीवन में कैसी दुविधा आन पड़ी????जिन्दगी में अजीब सा सन्नाटा छा गया.मीनू ने जेठ-जिठानी के कहने पर ही उनकी झोली में खुशियाँ डालने के लिए यह कदम उठाया था लेकिन...पहले से इस तरह का अंदेशा भी होता तो शायद....चंद दिनों पूर्व जिन ख्यावों में डूबी हुई थी,वो आज दिवास्वप्न सा लग रहा था....

      तेरे पर्दापर्ण की खबर सुन किलकारी सुनने को व्याकुल थे.....तब तेरे अस्तित्व से वो अपरिचित थे तो जिठानी जी की दुःख…

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Added by babitagupta on June 24, 2018 at 3:00pm — 8 Comments

पिता वट वृक्ष की तरह होते हैं........[सामाजिक सरोकार]

चट्टान की तरह दिखने वाले पाषाण ह्रदय पिता नारियल के समान होते हैं पर उनका एहसास मोम की तरह होता हैं.सख्त,खुरदुरे,अनुशासन प्रिय पर अंतर्मन सरलतम पिता उस संस्कारी गहरी जड़ों वाले वट वृक्ष की तरह होते हैं जिसकी विशालतम स्नेह्सिल छाया तले हम बच्चे और हमारी माँ पलती हैं.क्योकि वह पारिवारिक जिम्मेदारी का वह सारथी हैं जिस पर सभी अपनी उम्मीदों को पूरा करने का सपना संजोते हैं.और वह एक महानायक की तरह सभी को बराबर का हक देकर,अपने नाम से पहचान दिलाता हैं.जीवन की रह दिखाने…

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Added by babitagupta on June 17, 2018 at 10:04pm — 5 Comments

भविष्य के जनक [कविता]

जल्दी चलो माँ,जल्दी चलो बावा,

देर होती हैं,चलो ना,बुआ-चाचा,

बन ठनकर हंसते-मुस्कराते जाते,

परीक्षा फल सुनने को अकुलाते,

मैदान में परिजन संग बच्चों का तांता कतार बद्ध थे,

विराजमान शिक्षकों के माथे पर बल पड़े हुए  थे,…

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Added by babitagupta on June 3, 2018 at 7:33pm — 5 Comments

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