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Meena Pathak's Blog – June 2014 Archive (6)

हाइकू

अहंकार ना

कभी आ जाये हमें

दिन न आये |

 

मनमोहन

छेड़े बंसी की तान

झूमती आऊं |

 

तनहा तुम

देगा न कोई साथ

खयाल रहे |

प्रकृति हमें

देती सब संपदा

लगाएं वृक्ष |

 

समेट रही

आँचल में अपने

पुष्प बिखरे |

         

अजनबी हम

चलते रहे साथ

इक दूजे के |

 

माता का हाथ

रहे सदैव माथ 

धन्य जीवन |

 

पारिजात…

Continue

Added by Meena Pathak on June 30, 2014 at 5:24pm — 17 Comments

दोहे --मीना पाठक

हे भगवन वर दीजिए, रहे सुखी संसार |
घर परिवार समाज पे, बरसे कृपा अपार ||


दीन दुखी कोई न हो, ना सूखे की मार |
अम्बर बरसे प्रेम से, भरे अन्न भण्डार ||

कृपा करो हे शारदे, बढ़े कलम की धार |
अक्षर चमके दूर से, शब्द मिले भरमार ||

बेटी सदन की लक्ष्मी, मिले उसे सम्मान |
रोती जिस घर में बहू, होती विपत निधान ||

मीना पाठक 
मौलिक अप्रकाशित 

(दोहों पर एक छोटा सा प्रयास है )

Added by Meena Pathak on June 25, 2014 at 12:00pm — 27 Comments

कुण्डलिया छन्द -- (पहला प्रयास )

लग कर छाती से हुए, बडे और बलवान
निज जननी के सामने, ठाडे सीना तान
ठाडे सीना तान , लाज आये ना उनको
बेशर्मी ली लाद , न भाये अपने मन को
आहत है माँ खूब, दुखी रातों में जगकर
चूसे मां का खून , पले जो छाती लगकर ||

मीना पाठक 
मौलिक अप्रकाशित 

Added by Meena Pathak on June 21, 2014 at 11:13pm — 17 Comments

चलो एक वृक्ष लगाएँ !

चलो एक वृक्ष लगाएं

करें पुण्य का काम

जो दे हम सब को

जीवन भर आराम

चलो एक वृक्ष लगाएं |



धरती माँ का गहना है ये

है ये उनका रूप श्रृंगार

पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा

देता हमको जीवन दान

चलो एक वृक्ष लगाएं |



बरगद, पीपल, नीम, पाकड़

तुलसी, अक्षय, पारिजात

ये सब है उपहार प्रकृति का

मिला है सबको एक समान

चलो एक वृक्ष लगाएं |



जल का संग्रह करना है अब

सोच लें गर हम सब इक बार

वर्षा जल संचित कर के हम…

Continue

Added by Meena Pathak on June 20, 2014 at 8:30am — 13 Comments

मेरे लाल भूल न जाना ये बात !!

मेरे बच्चे !!

खुश रहो तुम हरदम

न आये जीवन में तुम्हारे कोई गम

हो माँ शारदे की अनुकम्पा

भरपूर हो स्वास्थ, संपदा,

पर मेरे बच्चे, याद रखना हमेशा

जीवन में एक अच्छा इंसान बनना

साथ तुम्हारे चले जो जीवन पथ पर

करना उसका भी आदर

बहे न कभी तुम्हारे कारण

उसकी आँख का काजल,

करना न तुम कभी प्रकृति का दोहन

लेना उससे उतना ही जितनी हो जरुरत

अंत में है मेरा आशीर्वाद !

घर-परिवार, समाज, राष्ट्र

हर जगह हो तुम्हारा ऊँचा नाम

मेरे लाल…

Continue

Added by Meena Pathak on June 11, 2014 at 1:59am — 19 Comments

नदी

         

वो नदी जो गिरि

कन्दराओं से निकल

पत्थरों के बीच से

बनाती राह

 

कितनो की मैल धोते

कितने शव आँचल मे लपेटे

अन्दर कोलाहल समेटे

अपने पथ पर,

 

कोई पत्थर मार

सीना चीर देता 

कोई भारी चप्पुओं से

छाती पर करता प्रहार

लगातार,

 

सब सहती हुई

राह दिखाती राही को

तृप्त करती तृषा सब की

अग्रसर रहती अनवरत

तब तक, जब तक खो न…

Continue

Added by Meena Pathak on June 4, 2014 at 12:58pm — 22 Comments

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