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मोहन बेगोवाल's Blog – May 2018 Archive (4)

पर्दा (लघुकथा)

पर्दा

हर समय मुस्कराता चेहरा, और दूसरों के चेहरे पे मुस्कराहट बिखेर देना उस का बाएँ हाथ का काम था।

कई बार मैं खुद छुप कर आईने के सामने उस जैसा मुस्कराने की कोशिश करता, मगर असफल रहता ।

तब खुद को कहता “क्या कमी है, अगर मैं मुस्करा दूँ तो कौन सा पहाड़ गिर जायेगा ?”

मगर कल शाम से सारा मौहला उदास नज़र आ रहा था ।

किसी ने आकर बताया कि सुबह के दस बज गए, अभी तक दरवाज़ा नहीं खुला था।

मैं और भी उदास हो गया,पता नहीं चल रहा ऐसा क्यूँ हुआ।

तब मेरे कानों में इक आवाज़ सुनाई… Continue

Added by मोहन बेगोवाल on May 12, 2018 at 6:18pm — 5 Comments

अपनत्व की खुशबु (लघुकथा )

शहर के बड़े शिवपुरी में उस कि अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी, इस शिवपुरी में मैं कई बार अंतिम संस्कारों में शामिल हो चूका था| मगर जिस तरह का हजूम आज राजेंद्र मास्टर के साथ आया था, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा था| सभी आंखें नम थी और इधर उधर चारों तरफ चीकें सुनाई दे रही थी किसी को उसके इस तरह जाने पे यकीन नहीं हो रहा था| 

कोई ये कह रहा था, “क्या ऐसा भी हो सकता है, मगर दुर्घटना कब, कहाँ हो जाए कहाँ पता चलता है इसके बारे कोई कुछ नहीं कह सकता”|

“मगर बचातो जा सकता है, इसके लिए प्रबंध तो…

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Added by मोहन बेगोवाल on May 11, 2018 at 3:30pm — 4 Comments

अधूरा रिश्ता (लघुकथा)

वार्ड के बिस्तर पर वह निढ़ाल पड़ा है, डॉक्टर कह रहे हैं कि ये नीला पड़ गया है, उन्होंने पुलिस को भी बुला लिया है |

“नीला तो पैदा होते समय ही था, अब क्या होगा ?”, किसी पास खड़े ने कहा | 

बात निकलती हुई इस पर आ कर रुक गई, सुबह तो नए कपड़े पहन और चौर बाज़ार से खरीदी काली एनक लगा कि गया था 

काले चश्में का एक फायदा तो ये था कि आंख का टीर भी नजर नही आता था |

अभी कुछ दिन हुए घर वाली रब को प्यारी हो गई थी | 

कुछ…

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Added by मोहन बेगोवाल on May 4, 2018 at 10:30pm — 5 Comments

पिता पुत्र(लघुकथा)

सतवंत पहले से ही मेरे साथ इस के बारे में बात कर चूका था। लेकिन जिस दिन से उसने मुझसे बात की थी, कोई भी पुराना साथी उसके पास नहीं आया और न ही वह किसी को मिलने गया था। मगर उस दिन से घर के लोगों ने उस से बात करना बंद कर दी थी ।

हद तो उस रोज़ हो गई जब इक दिन बाप हाथ में जूती ले कर सतवंत के पीछे दौड़ पड़ा और ये ध्यान भी नहीं किया के लोग क्या कहेंगे, तब सतवंत को लगा था कि इस जिंदगी का क्या फायदा जब बीस को पार कर चुके बच्चे पे माँ बाप को यकीन न रहे , तब कोई और क्या करे ? बड़े भाई से सतवंत ने फोन…

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Added by मोहन बेगोवाल on May 2, 2018 at 7:30pm — 7 Comments

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