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AMAN SINHA's Blog – May 2022 Archive (7)

मानसिक रोग

अक्सर मैंने देखा उसको खुद से हीं बातें करते

कभी-कभी बिना कारण हीं खुद में हंसते खुद में रोते

कई दफा तो काटी उसने रातें यूं ही जाग जाग के 

कभी किसी पर अटक गई जो पलकें उसकी बिना झपके 

        

बैठे-बैठे खो जाती है वो…

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Added by AMAN SINHA on May 31, 2022 at 9:30am — 2 Comments

क्या रंग है आँसू का

क्या रंग है आँसू का कैसे कोई बतलाएगा?

सुख का है या दु:ख का है ये कोई कैसे समझाएगा?

कभी किसी के खो जाने से, कोई कभी मिल जाए तो 

कभी कोई जो दूर हो गया, कोई पास कभी आ जाए तो 

किस भाव में कितना बहता, कोई ध्यान नहीं रखता

हर हाल में इसका एक ही रंग है, फर्क ना कोई कर सकता 

कभी दर्द में बह जाता है, हंसी में भी ये दूर…

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Added by AMAN SINHA on May 25, 2022 at 11:47am — 2 Comments

तुम वीरांगना हो जीवन की

तुम वीरांगना हो जीवन की, तुम अपने पथ पर डटी रहो

चाहे उलाहना पाओ जितनी, तुम अपने जिद पर अड़ी रहो



गर्भ में ही मारेंगे तुमको, वो सांस नहीं लेने देंगे 

कली मसल कर रख देंगे वो फूल नही बनने देंगे 

तुम मगर गर्भ से निकल कर अपनी खुशबू बिखरा दो 

तुम वीरांगना हो जीवन की, तुम अपने पथ पर डटी रहो



चाहे पथ पर पत्थर फेंके, शिक्षा से रोके तुमको 

कुछ पुराने मनोवृत्ति वाले चूल्हे में झोंके तुमको 

तुम ना डिगना अपने प्रण से, एकाग्रचित्त हो जमी…

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Added by AMAN SINHA on May 21, 2022 at 11:59am — No Comments

मैं धरती बोल रही हूँ

मैं धरती बोल रही हूँ,

हाँ-हाँ धरती बोल रही हूँ

अपनी व्यथा सुनाने को मैं

मैं कब से डोल रही हूँ

मैं धरती बोल रही हूँ

 

मैंने ही तुमको जन्म दिया…

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Added by AMAN SINHA on May 16, 2022 at 11:30am — 2 Comments

तलाक़

दर्द है ये दो दिलों का, एक का होता नहीं

जागते है संग दोनों, कोई भी सोता नहीं

ये ख़ुशी है या के ग़म है, कोई कह सकता नहीं

दर्द का वैसे भी यारो, रंग होता हीं नहीं

याद आती है घडी वो, जब पहली बार हम मिले थे

बसंत के वो दिन नहीं थे, पर फूल दिल में खिले थे

क्या हुआ जो…

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Added by AMAN SINHA on May 13, 2022 at 1:00pm — No Comments

अज्ञात

ख़यालों में मेरे ख़याल एक आता है

भरम मेरा मुझको यूं भरमा के जाता है

दिखता नहीं है पर कोई बातें करता है

नहीं साथ मेरे पर महसूस होता है

मैं अंजान उससे पर वो जानता है

वो है बस यहीं पर ये दिल मानता है

दिखा जो कहीं पर तो पहचान लूंगी

यही मर्ज़ मेरा है मैं जान लूंगी

वो है झोंका हवा का है अंदाज़…

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Added by AMAN SINHA on May 12, 2022 at 1:31pm — No Comments

पश्चाताप

तोड़े थे यकीन मैंने मुहल्ले की हर गली में

चैन हम कैसे पाते इतनी आहें लेकर

मौत हो जाए मेहरबा हमपे नामुमकिन है

ठोकरे हीं हमको मिलेंगी उसके दरवाज़े पर

हर परत रंग मेरा यूँ ही उतरता गया

ज़मी थी सख्त मैं मगर बस धंसता हीं गया

गुनाह जो मैंने किये थे बे-खयाली में

याद करके उन सबको मैं बस गिनता…

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Added by AMAN SINHA on May 6, 2022 at 12:54pm — 1 Comment

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