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Meena Pathak's Blog – April 2014 Archive (3)

प्रतीक्षा -- ( लघुकथा )

आज कल्पवास के आखरी दिन भी वो रोज की तरह पेड़ के नीचे बैठ चारो तरफ नजरें घुमा-घुमा कर किसी को ढूंड रही है जैसे किसी के आने की प्रतीक्षा हो उसे, पूरा दिन निकल गया शाम होने को है, सूर्य की प्रखर किरणें मद्धम पड़ चुकी हैं, पंक्षी अपने-अपने घोसलों में पहुँच गये हैं, बस् कुछ देर में ही दिन पूरी तरह रात्रि के आँचल में समा जाएगा पर अभी तक वो नही दिखा जिसका बर्षों से वो प्रतीक्षा कर रही है |

“वर्षों पहले इसी कुम्भ में कल्पवास के लिए छोड़ गया था ये कह कर की कल्पवास समाप्त होने पर आ के ले जाऊँगा पर…

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Added by Meena Pathak on April 28, 2014 at 7:00pm — 21 Comments

उत्तर दो ! (कविता)

सुन कर द्रोपदी की चित्कार

कलेजा धरती का फटा क्यों नहीं

देख उसके आँसुओं की धार  

अंगारे आसमां ने उगले क्यों नहीं

चुप क्यों थे विदुर व भीष्म

नेत्रहीन तो घृतराष्ट्र थे

द्रोण ने नेत्र क्यों बंद कर लिए

नजरें क्यों चुरा लिए पाँचों पांडवों ने  

कहाँ था अर्जुन का गांडीव

बल कहाँ था महाबली भीम का

क्या कोई वस्तु थी द्रोपदी

जिसे दाँव पर लगा दिया  

ये कौन सा धर्म था धर्मराज ?



कहाँ थे कृष्ण,

वो तो थी सखी तुम्हारी …

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Added by Meena Pathak on April 11, 2014 at 2:00pm — 23 Comments

एक दूसरे के प्रति त्याग और समर्पण ही सच्चा प्रेम है

एक स्त्री का जब जन्म होता है तभी से उसके लालन पालन और संस्कारों में स्त्रीयोचित गुण डाले जाने लगते हैं | जैसे-जैसे वो बड़ी होती है उसके अन्दर वो गुण विकसित होने लगते है | प्रेम, धैर्य, समर्पण, त्याग ये सभी भावनाएं वो किसी के लिए संजोने लगती है और यूँ ही मन ही मन किसी अनजाने अनदेखे राज कुमार के सपने देखने लगती है और उसी अनजाने से मन ही मन प्रेम करने लगती है | किशोरा अवस्था का प्रेम यौवन तक परिपक्व हो जाता है, तभी दस्तक होती है दिल पर और घर में राजकुमार के स्वागत की तैयारी होने लगती है | गाजे…

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Added by Meena Pathak on April 9, 2014 at 6:40pm — 18 Comments

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