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Saurabh Pandey's Blog – March 2014 Archive (3)

पाँच चुनावी दोहे (संंख्या - 2) // --सौरभ

हर चूहा चालाक है, ढूँढे  सही  जहाज

डगमग दिखा जहाज ग़र, कूद भगे बिन लाज



सजी हाट में घूमती, बटमारों की जात

माल-लूट के पूर्व ही, करती लत्तमलात



नाटक के इस…

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Added by Saurabh Pandey on March 24, 2014 at 12:30am — 19 Comments

पाँच चुनावी दोहे // --सौरभ

राजनीति में पार्टियाँ निभा रहीं पहचान

डंडे पत्थर गालियों  का आदान-प्रदान



जो बोले तू झूठ वो   मैं बोलूँ वो तथ्य

लफ़्फ़ाज़ी के रंग में लिपा-पुता हर कथ्य



झंडे टोपी भीड़ से  रोचक दिखे प्रसंग

देख जमूरा नाचता पब्लिक होती दंग  …



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Added by Saurabh Pandey on March 6, 2014 at 6:30pm — 20 Comments

शब्द के व्यापार में.. (नवगीत) // --सौरभ

पूछता है द्वार

चौखट से --

कहो, कितना खुलूँ मैं !



सोच ही में लक्ष्य से मिलकर

बजाता जोर ताली

या, अघाया चित्त

लोंदे सा,

पड़ा करता जुगाली.…



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Added by Saurabh Pandey on March 3, 2014 at 2:30pm — 41 Comments

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