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Bhasker Agrawal's Blog – February 2011 Archive (7)

मेरे मन के गलियारे में

वो क्या है जो मेरे मन के गलियारे में
खिलखिलाती हुई
मंडराती हुई तितली सी
कभी टिमटिमाती
कभी ओझल हो जाती
वो रौशनी सी
जिसके करीब हँसते मुस्कुराते
जीवन एक नृत्य लगे
वो कोमल सी पंखुड़ी
हवा के साथ उड़ती
मेरे चहरे पे बरस पड़ी
सब ठहर गया
गर्म सांसों को
मंजिल मिल गयी 
सब भुज गया
हम जल उठे
मेरे मन के गलियारे में..

Added by Bhasker Agrawal on February 28, 2011 at 12:36am — 7 Comments

क्या पाया तुमने

वो झूठी झूठी सी खुशी

वो बनावती सी हँसी

वो जबरदस्ती का रोना

कलाकारी है वो दुखी होना

अगर तुम यही कर सके

तो क्या पाया तुमने



वो मोहोताज संतुष्टि

वो सोच कर चुप रहना

वो लिखा हुआ सा कहना

वो भाव के विपरीत बहना

अगर ऐसे रुके हो तुम 

तो क्या पाया तुमने



वो दूसरों से पूछना खासियत अपनी

वो अपनी सफलता पर यकीन ना होना

वो मजाक जो हँसी के इन्तजार में रहता

वो शोक जो है अब जुबान से बहता

अगर ऐसे उलझे हो तुम

तो क्या पाया… Continue

Added by Bhasker Agrawal on February 23, 2011 at 7:00pm — 2 Comments

कारण

विज्ञान कहता है के हर चीज़ का कारण है..

ये बात समझ में आती है

पर कारण के होने का क्या कारण है ?

कहीं कारण भी दिमाग की ही कोई उपज तो नही

अगर ये हमारी बुद्धि का हिस्सा है और ये जानते हुए भी विज्ञान इसके पीछे भाग रहा है तो विज्ञान मुझे बुद्धि की कटपुतली भर ही प्रतीत होता है

ये ऐसा खेल… Continue

Added by Bhasker Agrawal on February 18, 2011 at 11:13pm — No Comments

उलझन

दीदार ए अजीमत से हम शर्माए बहुत हैं

बढ़ने से कदम मेरे घबराये बहुत हैं



गर भटक गया आदम तो चोंकना कैसा

जिंदगी रस्ते में तेरे दोराहे बहुत हैं



वो तो आसमां ही था जो नसीब ना हुआ

पिंजड़े में परिंदे फडफडाए बहुत हैं… Continue

Added by Bhasker Agrawal on February 15, 2011 at 9:30pm — No Comments

दुनियादारी (लघुकथा)



एक बार में ट्रेन में पुणे से मथुरा आ रहा था

जैसा की ज्यादातर यात्री करते हैं हम कुछ लोग भी एक मुद्दे पे बातचीत करके अपना समय काटने की कोशिश कर रहे थे

बात चल रही थी कश्मीर के हालातों पर .सब कश्मीर मुद्दे पे अपनी राय एक दूसरे को बता रहे थे

जैसा की हमेशा होता है मेरी राय ओरों से कुछ अलग ही थी और लोग उसपे सहमती नहीं दिखा रहे थे…

Continue

Added by Bhasker Agrawal on February 12, 2011 at 7:47pm — No Comments

बेमतलब का दिन

दिन बहुत देखे

रोज कोई खास दिन

कोई प्यार का दिन

कोई त्यौहार का दिन

कोई इजहार का दिन

हर दिन का एक मतलब है

छुट्टी का दिन जो सन डे है

बन गया वो अब फन डे है

काश कोई बेमतलब का दिन भी होता

जिसका कोई नाम न होता

करने को कोई काम न होता

मुश्किल किसी को आराम न होता

उस दिन की कोई परभाषा न होती

इक दूजे से कोई आशा न होती

किसी के मन में निराशा न होती

सब अपनी धुन में नाचते

अच्छा और बुरा न जांचते

जैसे चलती है हवा… Continue

Added by Bhasker Agrawal on February 7, 2011 at 3:09pm — 3 Comments

ऐब की बस्ती

कल ऐब की बस्ती में ख्वाबों का घर देखा

अदावत की सोहबत देखी शैदा बेघर देखा

 

दर्द नहीं मिट पाया यादों को तज़ा करके भी

जहाँ फकत फजीहत देखी माजी उधर देखा

 

हासिल हुई बेगारी मुझे मंजिल के…

Continue

Added by Bhasker Agrawal on February 3, 2011 at 4:55pm — 2 Comments

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