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चाँद नज़र ना आया तो गम है क्या
सितारों का साथ पाया ये कम है क्या

में तो खुद पे यकीन करता हूँ
नहीं जानता में के भरम है क्या

ना कर तू ज़ाहिर मुझको ख्वाइश अपनी
तेरी जरूरत में शामिल हम है क्या

चाहत मेरी मेरे ख्वाबों में बरसती है
नहीं पूछती मुझसे के सनम है क्या

क्या तू अपने अश्कों का असल जान सकता है
देख आरजू में तेरी इतना दम है क्या

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Comment

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Comment by Bhasker Agrawal on January 14, 2011 at 10:06am

विवेक जी और गणेश जी को धन्यवाद

और आप लोगों के दिए गए सुझवो के लिए विशेष धन्यवाद


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 13, 2011 at 8:26pm

भाष्कर भाई सुंदर ख्यालात हेतु बधाई , अच्छी ग़ज़ल कही है , सुधार की गुन्जाईस हर जगह होती है , विवेक भाई ने कुछ सुझाव दिया है किन्तु वो अपनी बात को मुक्कमल नहीं कर पाये है शायद ?

क्योकि यदि उनके अनुसार मतला कही जाय तो रदीफ़ "क्या गम है" नहीं होगा, बल्कि सिर्फ "है" होगा, और "म" शब्द से काफिये का निर्वहन करना होगा |

बहरहाल इस ग़ज़ल पर दाद स्वीकार करे |

Comment by विवेक मिश्र on January 13, 2011 at 2:14pm

/में तो खुद पे यकीन करता हूँ
नहीं जानता में के भरम है क्या /
उम्दा ख्याल है भास्कर जी. हार्दिक बधाई.


मतले के मिसरा-ए-उला में रदीफ़ 'है क्या' की जगह 'क्या गम है', भाव को और सही तरीके से उजागर करता है. एक बार पढ़कर देखें.

"चाँद नज़र ना आया तो क्या गम है
सितारों का साथ पाया ये क्या कम है"


बाकी, आप अपने विचारों के लिए स्वतंत्र हैं.

Comment by Bhasker Agrawal on January 13, 2011 at 12:02pm
धन्यवाद वीरेंद्र जी
Comment by Veerendra Jain on January 13, 2011 at 11:11am

क्या तू अपने अश्कों का असल जान सकता है
देख आरजू में तेरी इतना दम है क्या

 

Bahut badhiya.. Bhaskar ji...bahut bahut badhai

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