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Kanta roy's Blog – February 2016 Archive (7)

लिटिल चैम्पियन ( लघुकथा )

"महज़ सात वर्ष की उम्र में "सिल्वर स्क्रीन लिटिल चैम्पियन" जीतने वाला तुम्हारे डांसर बेटे का ,ये क्या हाल हो गया रेखा ?"

 " उस लिटिल चैम्पियनशिप ने ही तो उसको बरबाद किया है " उसने अपने आँखों में उतरे समंदर को संभालते हुए कहा ।

 " ये क्या कह रही हो तुम ! "

 "हाँ ,सच कह रही हूँ , उस चैम्पियनशिप जीतने के बाद नाचने में ही वह लगा रहा , पढ़ाई छूट गयी उसकी , और तुम तो जानती हो कि फिल्मी दुनिया के भाई -भतीजेवाद में कहाँ मिलता है बाहर वालों को स्थान ? "

 " वह स्टेज परफॉर्मर तो बन…

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Added by kanta roy on February 28, 2016 at 11:00am — 6 Comments

रिश्तों की धुलाई / लघुकथा

उसने आज अपने सभी नये पुराने रिश्तों को धोकर साफ़ करने के विचार से , काली संदूक से उन्हें बाहर निकाला ।

पानी में गलाकर ,साबुन से घिसकर , खूब धोया । कितने मैल, कितनी काई , छूटकर नाली में बही , लेकिन उनमें से मैल निकलना अभी तक जारी था ।

रिश्तों की काई धोते - धोते हठात् पानी खत्म होने का एहसास हुआ । जरा सा पानीे बचा था ।

लगे हाथ उसने दोस्ती को बिना साबुन ही खंगाल लिया ।

उसे यकीन था , रगड़ कर धोये हुए समस्त रिश्ते चमक गये होंगे ।

सुखाने के लिये तार पर फैलाते वक्त वह चकित हुआ… Continue

Added by kanta roy on February 24, 2016 at 11:03am — 9 Comments

भूख और पेट / लघुकथा / कान्ता राॅय

आज फिर सुबह - सुबह वह सलाम बजाने पहुँच गया उनके घर । साथ में ब्रेड - अंडे का पैकेट भी ले आया था । खाली हाथ कैसे आता भला ! वे अफसर जो ठहरे ! सुना था कि उनको भूख बहुत लगती है ।

लेकिन भूखा तो वह भी था । उसके पेट में भी दिनों दिन भूख की आग बढ़ रही थी ।

लेकिन क्या करें ! नित नये पैंतरे बदलता ,जाने कब किस बात पर वे खुश हो जाये और उसका काम बन जायें !

सरकारी अफसरों का मिजाज़ और उनकी भूख , तो वह जानता था , पर मिटाने का तरीका अभी सीख रहा था ।



शुरू - शुरू में तो काजू की बरफी भी… Continue

Added by kanta roy on February 23, 2016 at 7:00am — 8 Comments

मोह के धागे / कहानी / कान्ता राॅय

घर से बहुत दूर निकल आई थी । जाने क्या उद्वेग था कि छोड़ आई पल भर में सब कुछ । पिछले कई सालों से मन बडा उद्विग्न था । जतन करके संभाल रखा  था  लेकिन बाढ़ का पानी ,  सुनता है क्या कभी किसी घाट या  तटबंध को ! सो वेग ना सम्भल सकी , टूट गई । आते वक्त , घर से चार कदम दूर ही निकली थी कि आॅटो मिल गया ।

ऐसा लगा जैसे वह मेरा इंतज़ार ही कर रहा था ।



" स्टेशन चलोगे ? "



" बैठिये "



" कितना लोगे ? "



" १६० रूपये "



" क्या ,मीटर से नहीं चलोगे ?… Continue

Added by kanta roy on February 18, 2016 at 12:55pm — 17 Comments

वापसी जीवन के उस पार से /कहानी / कान्ता रॉय , भोपाल।

अचानक से कुछ होने लगा था । हल्का सा चक्कर और  पेपर हाथ से सरककर नीचे गिर पडा़ । उठाने को हाथ बढाया तो एहसास हुआ कि  शिथिल पड़ चुका  था मै । देह भी निष्प्राण से हो चले थे । आँखों में ही अब   होश बाकी था शायद ।सब देख और सुन पा रहा था  ।  बगल वाले कमरे में नये साल की पार्टी  अब भी जारी  थी । घर के सब सदस्य ,  बेटे- बहू, नाती- पोते , आज इकट्ठे हो गये थे  जश्न मनाने के लिए ।

मुझे पार्टी में ही तबियत नासाज   लग  रही थी । मै चुपके से  अपने कमरे में आकर  इस आराम चेयर पर एकदम…

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Added by kanta roy on February 16, 2016 at 11:45pm — 7 Comments

तुम परी हो / कविता

तुम घर मत आना कभी

तुम्हें कसम है मेरी



तुम्हारा संसार है सपनों सा

और तुम परी जैसी

तुम्हारा मन है कोमल

और तुम निर्मल सी

तुम्हारी कोमलता

तुम्हारी निर्मलता

सहन ना कर पायेंगी

यहाँ की विसंगति



यहाँ जल रहे है बाग

टूट रहे है आशियाने

सब है धुआँ धुआँ

घुट रही है जिंदगी





गये सब शानो असबाब

जल गये राजमहल

रह गई है बस सित्कार

जमीन पर यहीं



काँटे ही काँटे

ना सह पाओगी इन शूलों को

ना रह… Continue

Added by kanta roy on February 4, 2016 at 5:30pm — 6 Comments

ये शबे -गम किसने दी दिल को / गजल

ये शबे-गम किसने  दिया  दिल को

किसने अपना बना लिया दिल को



मेरी नजरों में तेरे ख्वाब सनम

कह रहे हैं ये शुकरिया दिल को



इश्क तुमसे किया है शिद्दत से

और बे चैन कर लिया दिल को



पीला-पीला बसंती सा आंचल

मिस्ल-ए-गुलशन बना गया दिल को



चाँदनी दूर जा के चमके कहीं

हमने अब तो जला लिया दिल को



रूठी तकदीर आज जागी है

कौई तकदीर दे गया दिल को



छुप गया चाँद रात होने पर

उसने जब प्यार से छुआ दिल को



तंग…

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Added by kanta roy on February 2, 2016 at 1:00pm — 5 Comments

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