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Ashish Srivastava's Blog – January 2014 Archive (3)

दुर्मिल सवैया - दो छंद

हर बार यही दिल बोल रहा , उनका पिय जो अब मीच जली 
अपना अपराध नहीं कुछ था,फिर भी कहि कै तुम नीच जली  
उस राह सिवाय विकल्प नहीं, बन प्रेम धरा इहि कीच जली 
हमसे वह क्यूँ टकराय गयी , इहि कारन टोकरि बीच जली 
+++++++++++++++++++++++++++++++++++++

खनकी,झनकी,लिपटी मुझसे पियकी चुटकी चटकी सि भली   

हलकी फुलकी छलकी बलकी, ठुमकी सिमटी सलकी सि कली 

अछरी, लहरी गहरी उमरी ,  अंधरी बिजुरी धुंधरी सि गली 
निकरी निय टोकरि प्रेम…
Continue

Added by Ashish Srivastava on January 21, 2014 at 11:08am — 6 Comments

घनाक्षरी

ममता का चित बड़ा चंचल चपल तब 

तन मे सचल मन बड़ा ही प्रचल है 

रमता ये जोगी छोटा नाटा ये कपट कब   

तन में उदित मन बड़ा ही स्वचल है

समता का भाव जागा मन में भी मेरे अब   

तन में न हलचल मन निशचल है  

तमता नहीं है भाव में रहे निचल रब  

तल में अतल में वितल में अचल है  

मौलिक एवं अप्रकाशित 

आशीष (सागर सुमन)

Added by Ashish Srivastava on January 8, 2014 at 5:58pm — 9 Comments

घनाक्षरी छंद - मन हरण

गीत भी लिखे कलम भारती के गान के तो,
कागज भी नाच के ही आन करने लगा

वंदन हजार माँ को छंद ने किये है और 
पंक्ति पंक्ति लिख के ही गान करने लगा 

स्याही शूर वीरता के मंत्र लिखती गयी तो  
अक्षर भी अक्षर का मान करने लगा 

देशप्रेम वाला भाव मन में बसा लिया तो   
शब्द शब्द राष्ट्र को सलाम करने लगा 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

आशीष ( सागर सुमन)  

Added by Ashish Srivastava on January 8, 2014 at 11:00am — 12 Comments

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