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Dr. Vijai Shanker's Blog – January 2015 Archive (7)

सरकार - इनकी उनकी--- डॉo विजय शंकर

लोगों की , लोगों से , लोगों के लिए
सरकार होती है ,
हमने इनकी , उनकी ,
हर इनकी , हर उनकी ,
सरकार बना दी , लोगों से छीन कर ।
हालात ये हैं कि अब हर एक
ठगा सा लगता है,
दूसरे की हो सरकार तो
डरा डरा सा लगता है ॥
खुद अपनी हो सरकार तो
ज्यादा ही अड़ा अड़ा सा लगता है ॥
अपनी स्वतंत्रता , अपना राज , अपनी सरकार ,
सब कुछ अपना अपना है , दूजे सब बेकार ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित
डॉo विजय शंकर

Added by Dr. Vijai Shanker on January 29, 2015 at 10:29am — 30 Comments

जनतंत्र पूर्ण हो जाएगा --- डॉ o विजय शंकर

ये हुकूमतें , ये शान,

ये ऐशो -आराम ,

किस से हैं , किस की बदौलत हैं ,

जिस दिन ये यह अहसास हो जाएगा ,

उस दिन जनतंत्र भी पूर्ण हो जाएगा ॥



बत्तीस रूपये प्रतिदिन में

जिंदगी गुजारने वाले,

किसके बनाये हुए हैं ,

इनकी सोच , इन्होंने ही

एक एक वोट जोड़कर ,

तुझ जैसों को राजा बनाया है ||



महल की ऊपरी आखिरी ईंट तक

बुनियाद की शुक्रगुजार होती है ,

ख्याल कर ,

ये कब से तुझको

इतना ऊंचा उठाये हैं अपने सिर पर ,

इनका तो ख्याल… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on January 26, 2015 at 11:10am — 19 Comments

कितनी अपनी है जिंदगी --- डॉ o विजय शंकर

अपनी होते हुए भी कितनी अपनी है जिंदगी ,

हम नाचते हैं जिंदगी भर , नचाती है जिंदगी।



बस में बिलकुल नहीं है किसी के भी जिंदगी

खुद पर जिंदगी भर कितनी हावी है जिंदगी।



हसरत है तुझे जी लें एक बार अपने ही ढंग से

पर तू तो अपने ही ढंग से जिलाती है जिंदगी।



वो नाचने वाला है ,हुनर है , यही रोजी है उसकी ,

उसको भी अपने ही ढंग से नचाती है जिन्दंगी |



उसकी मर्जी ,करम कैसे - कैसे कराती है जिंदगी

निष्ठुर अपने ही ढंग से हँसाती-रुलाती है जिंदगी… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on January 23, 2015 at 10:42am — 15 Comments

जन भ्रमित है , मन भ्रमित है -- डॉ o विजय शंकर

जन भ्रमित है ,

मन भ्रमित है ,

जन-इच्छा , बनी नहीं ,

जन-शक्ति , जगी नहीं ,

जनतंत्र है , तंत्र को

जन की ही खबर नहीं ,

कोई फ़िकर नहीं |

तंत्र जन जन से दूर है ,

जन तंत्र से मजबूर है ,

विवश है, लाचार है,

डरा ,सहमा , बीमार है,

कुछ कह नहीं पाता ,

जनादेश देने वाला,

आदेश , किसी को ,

दे नहीं पाता ,

तंत्र व्यस्त है , स्वयं में मस्त है ,

जन उपेक्षित है , हालात से त्रस्त है ,

तंत्र क्या क्या पा रहा है,

जन क्या क्या खो… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on January 20, 2015 at 9:07am — 23 Comments

अच्छे दिन व्यापार हुआ करते हैं-- डॉ o विजय शंकर

दुआओं में याद कीजियेगा ,

जब याद कीजियेगा ,

दुआ कीजियेगा।

मिलते हैं तो कहते हैं ,

आपकी सुबह अच्छी हो ,

शाम अच्छी हो ,

रात अच्छी हो,

जितनी बार मिलते हैं , हर बार कहते हैं ।

दिन रहते , विदा होते हैं , तो

आपका दिन अच्छा हो , कहते हैं ।

दुआओं में असर होता है ,

लोग यूँ भी दुआ करते हैं ,

हाथ मिला कर कहते हैं,

सिर को थोड़ा झुका कर कहते हैं ,

मुस्कुरा कर कहते हैं ,

जिसे जानते हैं , उस से कहते हैं ,

नहीं जानते , उस से भी…

Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on January 18, 2015 at 11:30am — 14 Comments

जीवन, रेखा पार -- डॉo विजय शंकर

गरीब होता नहीं है ,

गरीब घोषित होता है ।

वैसे ही जैसे सूखा घोषित होता है,

जैसे बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र घोषित होता है ।

गरीबी की एक रेखा होती है ,

होती वो गरीबी अमीरी के बीच की है ,

सम्मान वश उसे गरीबी की रेखा कहते हैं ,

आदमी जितना इस रेखा को जानता है ,

उतना विषुवत रेखा को नहीं जानता है ।

उसको लांघ गए तो वाह,

गरीब घोषित होने के चांस बन गए ।

होना न होना तो अलग ,

हो भी गए तो क्या पा जाओगे ,

नहीं होगे तो क्या है, जो खो दोगे ।

हाँ, एक… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on January 8, 2015 at 2:00pm — 10 Comments

गरीबी - एक विषय : डॉo विजय शंकर

कवि थे ,

गरीबी बहुत है ,

अच्छे वाक-जाल में

बयान की , कविता अच्छी बनी ,

मित्रों ने चाय-वाय की फरमाइश की ,

खूब वाह-वाही मिली ,

चाय-वाय रात भर चली ||



लेखक थे ,

गरीबी पर लेख छपा था ,

दिन भर बधाईयाँ आती रहीं ,

बहुत खुश थे , आग्रह भी था ,

ख़ास मित्रों ,पत्नी और बच्चों को ,

मंहगे रेस्त्रां में डिनर पर ले गए ,

गरीबी पर डिस्कशन खूब हुआ ,

खाना - पीना देर रात तक हुआ ,

देर हो ही गयी , रात देर से लौटना हुआ ॥



फ्री… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on January 2, 2015 at 8:23pm — 20 Comments

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