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शिज्जु "शकूर"'s Blog – January 2017 Archive (3)

इस तरह हमने दिन गुज़ारा है- ग़ज़ल

2122 1212 22/112



इस तरह हमने दिन गुज़ारा है

बारहा खुद को ही पुकारा है



संग से क्या डरेगा वो जिसने

कू ए क़ातिल में दिन ग़ुज़ारा है



ज़र्द पत्ता हूँ मैं खिजाँ ने मुझे

पेड़ की शाख से उतारा है



कम है सोचो तो काइनात भी और

जीना हो तो जहान सारा है



जज़्ब कर दर्द मुस्कुराहट में

हमने चेहरा बहुत सँवारा है



हमपे कुछ इख़्तियार तो रखते

जो हमारा है वो तुम्हारा है



बाँट सकते हो तुम भी अपने ग़म

“जो… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on January 31, 2017 at 9:11pm — 12 Comments

वक्त मेरे हाथों से, यूँ फिसल गया चुपचाप

212 1222 212 1222

वक्त मेरे हाथों से, यूँ फिसल गया चुपचाप

मेरी हर तमन्ना को, वो कुचल गया चुपचाप

 

चाक दिल, शिकस्ता पा, बेचराग़ गलियों से

भूल अपने ख्वाबों को, मैं निकल गया चुपचाप

 

एक आइना था…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on January 19, 2017 at 6:16pm — 7 Comments

सारे जहाँ को आप तो नादाँ समझते हैं

221 2121 1221 212

सारे जहाँ को आप तो नादाँ समझते हैं

हद ये है अपने आप को इंसाँ समझते हैं

 

अह्ल ए अदब जो चमके है औरों के ताब से

खुद को मगर वो लाल ए बदख़्शाँ समझते हैं

 

आमाल में हमारे ही कमियाँ न हों जनाब

शैतान को भी लोग मुसलमाँ समझते हैं

 

बातों से जब न बात बनी, सर झुका लिया

धोखे में हैं जो उसको पशेमाँ समझते हैं

 

फिरती है वो हलक में लिए जान, और आप

कुत्तों के बीच जीने को आसाँ समझते…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on January 11, 2017 at 11:40am — 12 Comments

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