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Govind pandit 'swapnadarshi'
  • Male
  • Bangalore, Karnataka
  • India
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Govind pandit 'swapnadarshi''s Friends

  • गिरिराज भंडारी
  • जितेन्द्र पस्टारिया
  • डॉ. सूर्या बाली "सूरज"
 

Govind pandit 'swapnadarshi''s Page

Profile Information

Gender
Male
City State
Bangalore
Native Place
Chandrapur
Profession
Banker

Govind pandit 'swapnadarshi''s Blog

हिन्दी दिवस - लघुकथा

उस दिन मैं हिन्दी दिवस के एक समारोह में शामिल होने के लिए शेयरिंग कैब में दिल्ली एयरपोर्ट से सिविल लाइंस जा रहा था। कैब में दो और सहयात्री सवार थे। वे दोनों पीछे की सीट पर और मैं फ्रंट सीट पर था। उन दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई तो पता चला एक मद्रासी तो दूसरा राजस्थानी है। 

मद्रासी – तुम कहाँ का रहनेवाला है ? 

राजस्थानी – आई’m फ़्रोम जयपुर, एंड यू ? 

मद्रासी – मैं चेन्नै में रहता। तुम क्या करता है ? 

राजस्थानी – आई’m ए एग्जीक्यूटिव इन बैंकिंग…

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Posted on October 3, 2016 at 6:44pm — 4 Comments

उम्मीदों की कश्ती

टिमटिमाते तारे की रोशनी में

मैंने भी एक सपना देखा है ।  

टुटे हुए तारे को गिरते देखकर

मैंने भी एक सपना देखा है ।  

सोचता हूं मन ही मन कभी

काश ! कोई ऐसा रंग होता

जिसे तन-बदन में लगाकर

सपनों के रंग में रंग जाता ।

बाहरी रंग के संसर्ग पाकर

मन भी वैसा रंगीन हो जाता ।

सपनों से जुड़ी है उम्मीदें, पर   

उम्मीदों की उस परिधि को

क्या नाम दूं ? सोचता हूं तो 

मन किसी अनजान भंवर में

दीर्घकाल तक उलझ जाता…

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Posted on August 24, 2016 at 10:13pm — 4 Comments

अपने हिस्से की जिन्दगी

रूपम के हाथों में मेहंदी लग रही थी. दामिनी चाहती थी कि इसके लिए पार्लर से मेहंदी डिजाइनर बुलवा लें, किंतु रूपम ने साफ मना कर दिया था. उसकी जिद्द के आगे दामिनी को झुकना ही पड़ा. मेहंदी, कपड़े, मेक अप इत्यादि के मामलों में रूपम ने अपनी सहेलियों को ज्यादा तरजीह दी थी. अपने वादों के मुताबिक उसकी सहेलियां शादी के चार दिन पहले ही रूपम के घर पहुंच चुकी थी. अपने लहंगे और अन्य कपड़ों की खरीदारी वह नीलिमा के मुताबिक कर रही थी. नीलिमा उसकी बेस्ट फ्रेंड थी जो मुम्बई में रहकर फैशन डिजाइनिंग का कोर्स…

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Posted on November 11, 2015 at 11:21am

मृगतृष्णा - कहानी

 

सरकारी नौकरी लगते ही रिश्तेवालों की सूची लम्बी हो गई थी. हर दिन एक नए रिश्ते लेकर कोई न कोई उसका घर चला आता था. अपनी मां से जब भी उसकी बातें होती वह लड़की के दादा परदादा से लेकर उसकी जनम कुण्डली तक बखान कर ही दम लेती. हर दिन रिश्ते के नए चेप्टर खुलते, उसके मन में इस बात को लेकर कुतूहल बना रहता था. उसे स्कूल के दिन याद हो आए थे. वहां भी हर रोज नए चेप्टर खुलते और नई-नई जानकारी मिलती थी. बात कुछ वैसी ही यहां पर भी उसके साथ हो रही थी. यहां भी हर रोज…

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Posted on September 26, 2015 at 10:23pm — 4 Comments

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At 9:35pm on May 15, 2015, जितेन्द्र पस्टारिया said…

आपकी मित्रता का हार्दिक स्वागत है, आदरणीय गोविन्द जी

सादर!

At 12:02pm on May 11, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आप अपनी मौलिक व अप्रकाशित रचना  यहाँ पोस्ट कर सकते है,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जाता है, रचना के अंत में"मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

At 1:13pm on May 10, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…
आदरणीय गोविन्द जी ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में आपका हार्दिक स्वागत है।
 
 
 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

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