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अयोध्या में जानकी घाट मंदिर के श्री वेदान्तीजी महाराज द्वारा सद्गुरु भवन,जयपुर में हनुमत कथा में दिए प्रवर्चन के अनुसार बजरंग बलि हनुमानजी महाराज, जो अजर अमर ब्रह्मचारी है, को जरा सा भी किसी ने दिया,उसे उन्होंने ढेर सारा लौटाया है | बजरंग बलि हनुमानजी की सलाह विभीषण ने मानी,तो लंका का ताज मिला |"तुमरो मन्त्र विभीषण माना,लंकेश्वर भये सब जग जाना" लंका में सभी घरो से रुई,कपड़ा, घी-तेल लानेवालो के घर में प्रसाद स्वरुप अपनी जलती पूंछ से प्रसाद स्वरुप अवशेष गिराया, जिससे घर जल गए | विभीषणजी के घर से पूंछ में आग लगाने रुई,घी,तेल कुछ नहीं आया तो हनुमानजी जलती पूंछ से उनके घर नहीं गए |  दरअसल लंका, लंका वासियों की करतूतसे जली, न की हनुमान जी द्वारा |  जब प्रभु राम साकेत गमन करते समय अपने भक्तो से पूँछ रहे थे,उनके साथ कौन कौन चलना चाहता है, तो हनुमानजी ने उलट पूंछा, क्या वहां भी रामकथा सुनाने को मिलेगी | इस पर प्रभु राम ने कहाँ नहीं, वहां रामकथा सुनने को नहीं मिलेगी, तो हनुमानजी ने प्रभु राम के साथ साकेत जाने के बजाय प्रथ्वी पर ही रहना स्वीकार किया ताकि जहाँ भी रामकथा हो, वहां उपस्थित रह रामकथा सुन सके| "प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया"| जहाँ प्रभु श्रीराम अवतरित होते है, वहां श्री हनुमानजी अनिवार्य रूप से उनकी सेवा में रहते है | द्वापर युग में श्रीकृष्ण जब अर्जुन के सारथि बने तो रथ की ध्वजा पर बजरंगबलि हनुमान जी विराजमान थे | कलियुग में भी तुलसीदास बाबा को श्री राम के दर्शन-हनुमानजी की कृपा से ही हुए थे | पेड़ पर बैठे"तुलसीदास चन्दन घिसे,तिलक लेट रघुबीर" दोहा बोल आभास कराया | अतः सहज रूप उपलब्ध श्री हनुमान की ह्रदयसे भक्त करने पर हनुमान जी अवश्य ही कृपा करते है, इसमें संदेह नहीं है | 

-लक्ष्मण लडीवाला,जयपुर"कृष्ण साकेत"१६५-गंगोत्री नगर,टोंक रोड, जयपुर-१८ 

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