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कृति चर्चा: आम आदमी के दर्द के आलेख : सुमित्र के व्यंग्य लेख चर्चाकार: संजीव 'सलिल'

कृति चर्चा:

आम आदमी के  दर्द के आलेख : सुमित्र के व्यंग्य लेख

चर्चाकार: संजीव 'सलिल'

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व्यंग्य लेखन साहित्य की वह विधा है जो कालखंड विशेष की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पारिवारिक तथा वैयक्तिक विडम्बनाओं, विसंगतियों, अंतर्द्वंदों व आडम्बरों के त्रासद-हास्यद पक्षों को उद्घाटित कर दोगलेपन तथा पाखंड पर सीधा, तीखा किन्तु विनोदपूर्ण प्रहार करती है. व्यंग्य कभी व्यष्टि, कभी समष्टि, के माध्यम से परिस्थितियों, प्रणालियों, व्यवस्थाओं आदि पर शब्द-प्रहार कर भ्रष्टाचार, घृणा, शोषण, द्वेष, लोलुपता, स्वार्थपरता, कठमुल्लापन आदि को सामने लाता है किन्तु धर्मोपदेशक की तरह तजने का आग्रह  नहीं करता. व्यंग्य-लेखन का उद्देश्य पाठक के मन में गलत के प्रति वितृष्णा पैदा करना होता है, अंतर्मन में विरोध का भाव उत्पन्न करना होता है.

संस्कारधानी जबलपुर व्यंग्य को 'स्पिरिट' कहनेवाले किन्तु अपने प्रचुर और प्रभावी लेखन से हिंदी साहित्य में स्वतंत्र विधा का स्थान दिलानेवाले स्वनामधन्य व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की कर्मस्थली है. तुलसी के पौधे से भूमि पर गिरी मंजरियों से अनेक अंकुर प्रस्फुटित-पल्लवित होना स्वाभाविक है. परसाई की व्यंग्य लेखन मंजरी से संस्कारधानी में अंकुरित व्यंग्यकारों में सुमित्र चर्चित रहे हैं. परसाई जी के सान्निन्ध्य में समाज को सजग द्रिध्ती से निरखने-परखने का संस्कार पाकर विदूपताओं और विसंगतियों से व्यथित होने वाला तरुण पत्रकार सुमित्र उन्हें ललकारकर पटकनी देनेवाले व्यंग्यकार सुमित्र में कब-कैसे परिवर्तित हो गया संभवतः उसे भी पता नहीं चला. तभी तो दैनिक अख़बार के स्तम्भ के सीमित कलेवर में वह आम आदमी की व्यथा-कथा कहने का साहस जुटाकर कम शब्दों में गहरी बात कह सका.

इस संकलन के व्यंग्य लेखों में व्यापक अनुभव क्षेत्र की खोज, सामाजिक समस्याओं के विश्लेषण की प्रवृत्ति, दूर दृष्टि संपन्न सकारात्मक परिवर्तन की दिशा अन्तर्निहित है. सुमित्र जी के व्यंग्य तिलमिलाते नहीं सहलाते हैं. प्रसाद गुण संपन्न सांकेतिक अर्थ व्यंजना सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक बनकर पाठकों को आत्मावलोकन ही नहीं आत्मालोचन के लिये भी प्रेरित करती है. बँट रहा है भारत रत्न, महान जी, आप कतार में हैं, निंदक नियरे राखिए, नंगा और नंगपन, सूत न कपास, नमामि देवी चापलूसी-चुगलखोरी, बजट की वंशी, अथ मुगालता कथा, पढ़ो, बढ़ो और गिर पड़ो, आदि ३० व्यन्ग्य७अ लेख सुमित्र जी के सामाजिक सरोकारों. सरोकारों के प्रति संवेदनशील सजग दृष्टि तथा दृष्टिजनित सरोकारों का ऐसा वर्तुल निर्मित करते हैं जिसके केंद्र में आम आदमी की विवशता तथा जिजीविषा दोनों की सहभागिता संभव हो पाती है.

सुमित्र जी कि सहज चुटीली भाषा पाठक के मन को स्पर्श करती है- ' अब तो दुनिया ही बदल गई, पहले जैसे सरोवर अब कहाँ? पनिहारिनों का पनघट पर लगा वह स्वर्गीय मेला. सब स्वर्गीय हो गया. अब क्या है? केंचुए से नल देखो, नल की धार देखो और झोंटा छितराती नायिकाएं देखो. श्रृंगार का तो फट्टा ही साफ़ समझो. तुम कहोगे हम रो रहे हैं. क्यों न रोएँ? तुम्हारे समय में चार महीनों का ताप काफी गुल खिलाता था. काफी ऊर्जा दे जाता था. चंदन की काफी खपत हो जाती थी और चार माह के बाद में जब मेघराजाअपनी प्रेम-फुहार से धरती को सिंचित्कारते थे तो 'परिरंभ कुंभ' की मदिरा की छटा छिटक जाती थी. इधर तो साल भर से मेघों का गुरिल्लावार चल्लू है. पानी थामा ही नहीं, गया ही नहीं, और आज आषाढ़स्य प्रथम दिवसे. न धरती सूनी है, न उसके सिंचन से सौंधी गंध उठ रही है. अब आगे क्या होगा? संयोग-वियोग श्रृंगार की सभी संभावनाएं धूमिल हैं.''

प्रसिद्ध लेखिका एम. डब्ल्यू. मोंतेंग्यू के अनुसार: 'व्यंग्य एक तेज़ धार चाकू के समान है जो इस प्रकार घाव करता है कि स्पर्श तक का आभास भी  नहीं हो.' डॉ. सुमित्र की संवेदनशील परिपक्व सोच और भाषिक सामर्थ्य चाकू कवर को गुलाब के रेशमी स्पर्श में बदल देता है.
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