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प्रस्तुत कविता कक्षा-7 की मेरी छात्रा रितू
पाठक ने लिखा है,मैं इस कविता को उसकी
अनुमति से यहां पोस्ट कर रहा हूं।उसकी
बाल-सुलभ जिज्ञासा,आकांक्षा और कामना
दर्शनीय है।

ये ईश्वर की कैसी महिमा,
हम क्यों नहीं उड़ पाते हैं?
हम भी उड़ना चाहे लेकिन,
पंख नहीं मिल पाते हैं॥

ये ईश्वर की कैसी महिमा,
हम क्यों नहीं उड़ पाते हैं?
ये पंक्षी उड़ जाते हैं पर,
हम देख-देख ललचाते हैं॥

ये ईश्वर की कैसी महिमा,
हम क्यों नहीं उड़ पाते हैं?
ये पंक्षी खुश रहते हरदम,
हम चिंता में डूबे जाते हैं॥

ये ईश्वर की कैसी महिमा,
हम क्यों नहीं उड़ पाते हैं?
ये मीठे-मीठे गीत सुनाते,
हम आपस में लड़ जाते हैं॥

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Replies to This Discussion

आपको हार्दिक धन्यवाद भाई विन्ध्येश्वरजी. 

किसी अंकुर को धूप-बारिश, सर्दी-गर्मी लायक समर्थ होते देखना और फिर जरूरत भर की मिहनत से उसे पुष्ट करना किसी माता के हृदय की गहराई की मांग करता है.  बिटिया ऋतु की संभावनाओं को मेरा स्नेहपगा आशीष.  

ऋतु ही नहीं ओबीओ तमाम ऋतुओं की संभावनाओं भरी उड़ान के लिये निरभ्र आकाश बने,  इसकी अपेक्षा हम सभी को है. आप जैसे संवेदनशील और समर्थ माली साथ जुड़ रहे हैं, तो हम भी आश्वस्त हैं कि साहित्य-बगिया का पुष्पित-पल्लवित होना ही नहीं उसका संरक्षण भी सहज है.

गुरूदेव प्रणाम!
मान दिया इतना कि आसमान छूने को जी चाहता है।
धूलि में लोटकर साष्टांग करने को जी चाहता है।
गुरूदेव की कृपा से नामुकिन भी है मुमकिन,
बस इस कृपा पर वार जाने को जी चाहता है॥

आपका आशीर्वाद मैं प्यारी बिटिया रितु
तक प्रेषित करूंगा।आपके स्नेहाशीष से
निश्चय ही वह कृतकृत्य होगी
पल्लवित,पुष्पित एवं संरक्षित होकर नाम
अर्जित करेगी।और अगर यह ओ.बी.ओ. के
मंच से हो तो निश्चय ही मैं भी
गौरवान्वित होऊंगा।
जय ओ.बी.ओ.!!!जय गुरूदेव!!!

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