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(1). श्री मोहम्मद आरिफ जी

सच्चा प्यार
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समीर ने जवान लड़की को हाथों में उठाए घर में प्रवेश किया ।माँ शुभांगी कुछ समझ नहीं पाई ।आख़िर माजरा क्या है? फिर समीर ने लड़की को सोफा पर बैठाया ।
समीर-"माँ , आशीर्वाद दीजिए , मैंने इस लड़की से कोर्ट मैरिज कर ली है ,अपना जीवन साथी बना लिया है ।"सीमा ने भी सोफा से उतरते हुए दोनों पैरों को घसीटते हुए शुभांगी के चरणों को छुआ और आशीर्वाद माँगा । शुभांगी को अब माजरा समझ में आ गया था ।बोली-"बेटा ये लड़की तो अपाहिज है ।"
"हाँ माँ, सीमा अपाहिज है । दोनों पैर बचपन में पोलियो की चपेट में आ गए थे । मुझको सीमा से प्यार हो गया । हमसफर बनाने का फैसला कर लिया । अब ये आपकी बहू है ।"
"तेरा ताउम्र इसके साथ निबाह हो पाएगा ?"
"क्यों नहीं । प्रेम का वास्तविक सौन्दर्य शारीरिक आकर्षण नहीं बल्कि दिलों की गहराई से लेकर आत्मा की पवित्रता से जुड़ा है ।" अब माँ शुभांगी अनुत्तरित थी ।
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(2). सुश्री प्रतिभा पाण्डेय जी
‘खोई चिर्रैया’
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स्कूल के पार्क में लगे दो झूले एक लाल एक पीला , हवा में हिलते हिलते आपस में बतिया रहे थे I
“ घंटी बज गई , आती होंगी सोनू मोनू I “
“दोनों जब झूलती हैं, तब कितनी ख़ुशी होती है अपने झूले होने पर , हैं ना I”
“ हाँ ss, बस ऐसे ही झूलती रहें उडती रहें हमेशा ,कभी बड़ी नहीं हों I” लाल वाला भावुक हो रहा था I
सोनू मोनू , छठी में पढने वाली दो शैतान पक्की सहेलियाँ I खाने की घंटी बजते ही हवा की तेजी से पार्क के इन झूलों पर जम जातीं I लाल वाला मोनू का , पीला सोनू का I उनके झूलों पर बैठते ही झूलों को  मानो  पंख लग जाते I झूले  की पींगों के साथ उन दोनों के  बाल लाल रिबन की कैद तोड़ हवा में तैरने लगते , यूनिफार्म तितर बितर हो उड़ने लगती  और एक तरफ फेंकें जूते मोज़े , झूलों की तेज चर्र मर्र से सहमे  दुबके रहते I दोनों झूले इस रोमांचक उड़ान का रोज  बेसब्री से इंतज़ार करते थे I
आज मोनू ने झूलों की तरफ देखा भी नहीं , चुपचाप आकर  झूलों के पास वाली बेंच पर बैठ गई I   
“ चल मोनू झूलते हैं ना , क्या हो गया ?  बुखार है?” मोनू की चुप्पी  झेली नहीं जा रही थी सोनू सेI
“ नहीं I”
“ तो फिर ?”
“ सोनू , एक बात बताऊँ.. वो जो अंकल हैं ना जो दिल्ली से आये हैं हमारे घर , वो बहुत खराब हैं I” धीरे धीरे झिझक झिझक  कर बोल रही थी मोनू I
“ वो तो तेरे पापा के फ्रेंड हैं I तेरे लिए गिफ्ट भी लाये थे कितनी सारी I ऐसे क्यों बोल रही है ?”
“ .वो गंदे हैं , बहुत बहुत गंदे , मुझे डर लगता है उनसे  I” मोनू रोने लगी थी I
चुपचाप मोनू की बगल में बैठ गई सोनू I वो थोडा समझ रही थी थोडा नहीं I
पर झूलों को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था I वो तो  बस जोर जोर से चीख़ चीख़ कर पूछे जा रहे थे I
“ क्यों नहीं झूल रही हो तुम दोनों ? क्या हुआ ?..क्या हुआ ?”
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(3). श्री सुनील वर्मा जी  
इक्कीस

घर पहुँचते ही वहाँ पसरे सन्नाटे को पढ़कर सुभाष जी समझ गये थे की सुबह पत्नी को कहे कठोर शब्दों का असर अभी तक है| आज सवेरे पत्नी को ड्राईविंग सीखाते हुए गाड़ी एक खंभे से जरा सी छू क्या गयी, वह आपा खो बैठे थे|
"हद है..तुमसे एक काम भी ढंग से नही होता | ध्यान कहाँ रहता है तुम्हारा? कोई भी काम कहो..हमेशा उन्नीस ही निकलती हो |"
अपमान का घूँट पीकर पत्नी अपने पक्ष में जवाब देने की जगह मौन हो गयी, जो रिश्ते को ज्यादा प्रभावित कर रहा था |
हाथ-पैर धोने के बाद खाने के लिए बैठने पर पत्नी ने उन्हें भोजन की थाली परोस दी | निवाला तोड़कर मुँह में रखते ही उन्होने चुप्पी तोड़ते हुए कुछ अतिरिक्त जोर देकर कहा " अररे वाहह...आज तो क्या खूब खाना बना है | मजा आ गया |"
फिर पास ही बैठकर खाना खा रही अपनी दस वर्षीय बेटी की तरफ देखकर वह आगे बोले "एक बात तो माननी पड़ेगी, खाना बनाने में सब तुम्हारी मम्मी से नीचे ही हैं | ऐसा स्वाद तो किसी फाईव स्टार होटल के खाने में भी नही है |"
रसोई से प्लेट में दो रोटियाँ और लाकर मेज पर रखते हुए पत्नी ने कहा "नही हमें तो कोई काम ढंग से करना आता ही नही है | हम तो ठहरे हर काम में उन्नीस लोग.."
बदले में पति के जवाब की प्रतिक्षा किये बिना ही वह मुड़ी तो पास बैठी बेटी ने पिता से धीमी आवाज़ में पूछा "पापा ऐसा तो कुछ स्पेशल खाना नही बना आज..रोज जैसा ही तो है | फिर यह सब..!"
पति ने प्लेट से एक रोटी उठाकर अपनी थाली में रखी और एक नज़र रसोई में रोटियाँ बेलती हुई पत्नी की तरफ देखते हुए कहा " बेटी यह 'उन्नीस' से 'इक्कीस' होने की लड़ाई है, तू नही समझेगी.."
बेटी अपने मुँह में रखे निवाले को चबाते हुए उन दोनों के रिश्ते में छिपे उस 'बीस' को ढूँढ रही थी |
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(4).  डॉ विजय शंकर जी  
वाद-विवाद प्रतियोगिता


कालेज में वाद- विवाद प्रतियोगिता का आयोजन था। विषय था , " दुनियाँ में प्रेम से बड़ी कोई ताक़त नहीं होती है।"
छात्र - छात्राओं ने खूब बढ़ - चढ़ कर प्रतियोगिता में भाग लिया। हिंदी के उद्धरण , अंग्रेजी के कोटेशन यहां तक कि फ़िल्मी गाने तक प्रयोग में लाये गए।
परंतु विपक्ष में एक विद्यार्थी ने अचंभित कर देने वाला तर्क प्रस्तुत किया। उसने कहा , " यह सच है कि दुनियाँ में प्रेम से बड़ी कोई चीज़ है नहीं , पर यदि है तो केवल और केवल एक चीज़ है और वह है , नफ़रत। दुनिया में प्रेम में बर्बाद और तबाह होने वाले लोग तो उँगलियों पर गिने जा सकते हैं पर नफरत में तबाह होने वालों को दुनियाँ कभी गिन नहीं पायी है और न ही कभी गिन पायेगी। " उसके इस तर्क पर कुछ देर तक तो एक गहरा सा सन्नटा छाया रहा फिर धीरे - धीरे सब कुछ सामान्य सा होने लगा। प्रतियोगिता में निसंदेह उस छात्र को न कोई स्थान मिला न कोई पुरूस्कार परंतु वह आयोजकों और सभी उपस्थिति प्राध्यापकों और विद्यार्धियों के लिए एक अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गया।
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(5). सुश्री नयना(आरती)कानिटकर
एक प्रश्न अनुत्तरित-सा
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सोमेश की माँ और रुपा भाभी उसे जब देखने आयी थी तभी नेहा समझ गई थी कि वे थोड़ी नकचढी हैं और जबान पर काबू नही है। बडी बहू है ना घर की तो ठसका है शायद। देखने दिखाने की रस्म के बाद रुपा भाभी अचानक उसका हाथ पकड कमरे मे ले आई और बोली 
"जरा ब्लाउज की बाह नीचे करना , देखूँ तुम्हारे शरीर पर कही दाग तो नही है. वो क्या है कि तुम्हारे घर से जो स्लीवलेस ब्लाउज के साथ की फोटो आई है ना उसमे कंधे पर कुछ दाग है ऐसा लगा तो सोचा देख ही लूँ। बाद मे..." 
बडा अपमानित महसूस किया था उसने. उनके जाने पर माँ से विरोध भी जताया था. तो माँ ने कहा था
 " बेटा अच्छा है जो भी उन्हें लगा होगा पहले ही देख लिया , बाद मे कुछ नौटंकी करने से तो बेहतर है।" 
" मगर माँ! वो हमसे सीधे-सीधे पूछ भी तो सकती थी, ये ब्लाउज हटाकर... क्या मेरा कोई वजूद नही हैं।" 
" बेटा लडका अच्छा है .इन बातो को ज्यादा दिल से नही लगाते." सब ठीक होगा ." माँ बोली थी. a
एक आम मध्यमवर्गीय लडकी की तरह वो भी बस चुप हो गई थी. मगर वो बात कही ना कही उसे हमेशा अंदर तक सालती रही।
ससुराल आकर पता चला था कि देवर भाभी तो कई सालो से अबोला किए बैठे थे. मगर क्यों ? 
अपने पति सोमेश से भी कई बार पूछा पर जैसा कि "हर घर में होता है!" उसे एक ही जवाब मिलता "अभी तो खुश रहो वक्त आने पर सब बता दूँगा." 
आज ऐसा वक्त आया कि आय सी यू के बाहर बैठे-बैठे ह्रदय की धड़कने तेजी से चल रही थी पता नहीं क्या हुआ था रुपा भाभी को जो इतना बडा कदम उठा लिया. ऐसा क्या हुआ होगा जो दिल से लगा बैठी. सोमेश से पूछ्ने पर भी इस बार भी बस सिर्फ़ मौन। 
नर्स दौडती हुई आयी "जल्दी चलिए पेशेन्ट की हालत बहुत खराब है." 
" भाभी! भाभी! आँखे खोलिए...नेहा ने रुपा भाभी का हाथ थामते हुए कहा। 
रुपा भाभी आँखें खोलने का प्रयत्न कर रही थी. बोलने की कोशिश में उनके शब्द हलक मे ही अटक कर रह गये. पलटकर देखा सोमेश मूँह पर उंगली रख उन्हें चूप रहने का इशारा कर रहे थे। 
सब कुछ चलचित्र सा चल गया दिमाग में.विचार तेजी से चक्कर काट रहे थे। पाँच साल पहले वो ब्लाऊज हटा कर कंधे का दाग देखना......! एकबार फिर से वह बस ठगी सी खडी रह गई। 
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(6). श्री तस्दीक अहमद खान जी 
गुरूर 
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सुनामी के बहाने सागर ने जैसे ही ज़मीन की तरफ अपने हाथ और पैर फैलाए ज़मीन दर्द से कराह उठी ,उसने फ़ौरन सागर से कहा: 
"मैं मानती हूँ कि तुम दुनिया में सबसे बड़े हो ,ऊपर वाले ने तुम्हें 2/3 हिस्सा और मुझे 1|3 हिस्सा अता फरमाया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दूसरे की सरहद में घुस कर उसे तकलीफ़ पहुँचाओ "
सागर ने फ़ौरन जवाब में कहा:
"दुनिया की सरहद मह्दूद है ,मैं अपने हाथ और पैर कैसे फैलाउँ, अगर मैं एसा करता हूँ तो तुम मेरा क्या कर लोगी ?"
ज़मीन मायूस होती हुई फिर कहने लगी:
"ज़्यादा गुरूर ठीक नहीं ,ऊपर वाले से ख़ौफ़ खाओ ,तुम्हारी वजह से खुदा के बन्दो का जान माल का कितना नुक़सान हुआ है "
सागर ने ज़मीन की बात काटते हुए कहा:
"मैं तुम से ज़्यादा लोगों के काम आता हूँ लोग मेरे पानी की मछलियाँ खाते हैं ,मेरे पानी से बना नमक हर घर में इस्तेमाल होता है बादल मेरा पानी ले जाते हैं ,तुम पर बरसते हैं ,और जो पैदा होता है उसे लोग खाते हैं " 
ज़मीन सागर की बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़ी:
"पानी तो मेरे पास भी नदियों , तालाबों और कुओं में है जो तुम्हारे मुक़ाबले में कुछ भी नहीं है ,अगर तुम मेरे एक सवाल का जवाब दे दो तब मैं मान जाउगी कि तुम लोगों के गम ख्वार और सबसे ताक़तवर हो "
गुरूर में डूबा सागर फ़ौरन बोल उठा:
"तुम्हारा क्या सवाल है? "
ज़मीन ने धीरे से मुस्कराते हुए कहा:
"क्या तुम किसी प्यासे की प्यास बुझा सकते हो ?
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(7).  डॉ टी आर सुकुल जी 
अनुत्तरित प्रश्न (मूर्तियाॅ)

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‘‘ पापा ! बाजार के उस अंधेरे से कोने में वह क्या है ?‘‘
‘‘ अरे ! तुम्हें नहीं मालूम ? ये महामहोपाध्याय पंडित दिवाकर जी की मूर्ति है, तुम लोगों को चौथी/पांचवी कक्षा में इनके बारे में नहीं पढाया गया ?‘‘
‘‘ क्या वही, जो संस्कृत और भारतीय दर्शन के मूर्धन्य विद्वान रहे हैं और शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर पाया ?‘‘
‘‘ वही हैं, तत्कालीन लोगों ने उन्हें सम्मान देने के लिए उनकी मूर्ति यहाॅं स्थापित की थी । यहीं पर, एकत्रित होकर, इस मैदान में कभी धर्म सभायें की जाती थीं परन्तु म्युनीसिपल ने अब यहाॅं बाजार बना दिया है।‘‘
‘‘ लेकिन मूर्ति की यह दुर्दशा ? शायद अनेक वर्षों से कोई देखरेख नहीं। न तो आस पास ही सफाई है और न ही मूर्ति पर। अरे ! उस पर तो मकड़ियों और पक्षियों का डेरा है, ओ हो ! उनका यह कैसा सम्मान ?‘‘
‘‘ यह तो मूर्ति है, इस युग में जीवित विद्वानों का तो इससे भी बुरा हाल होता है, बेटा ! ‘‘
‘‘ लेकिन क्यों ? ‘‘
‘‘ पता नहीं , तुम इस पर रिसर्च करना।‘‘
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(8). श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय जी  
अनुत्तरित प्रश्न

टेबल लैंप के सामने पुस्तक रखते हुए पुत्र ने कहा , " पापाजी ! सर कल यह चित्रवाला पाठ पढ़ाएंगे. आप समझा दीजिए."
"लाओ ! यह तो बहुत सरल है. मैं समझा देता हूं."
फिर बारीबारी से चित्र पर हाथ रखते हुए बताया, " यह बीज है . इसे जमीन में बोया जाता है. यह अंकुरित होता है . पौधा बनता है . बड़ा होता है. पेड़ बनता है. इस में फूल आते हैं फिर फल लगते हैं." इस तरह पापा ने पाठ समझा दिया.
पुत्र की जिज्ञासा बढ़ी, "पापाजी ! पेड़ के बीज से पेड़ पैदा होता है ?"
"हां."
"मुर्गी अंडे देती है . उस से मुर्गी के बच्चे निकलते हैं," उसने मासूमसा सवाल पूछा.
"हां."
"तो पापाजी, यह बताइए कि हम कैसे पैदा होते हैं ?"
यह प्रश्न सुन कर पापाजी चकरा गए. कुछ नहीं सुझा . क्या कहूं ? क्या जवाब दूं ? कैसे जवाब दूं ?
बस दिमाग में यह प्रश्न घूम ने लगा, " हम कैसे पैदा होते है ?"
पुत्र के सवाल ने पापाजी को बगलें झाँकने पर विवश कर दिया. पुत्र ने पापाजी को मौन देख कर अपना प्रश्न पुन: दोहराया दिया. पापाजी ने सामने बैठी पत्नी की ओर देखा और आँखों ही आँखों में उस से पूछा, “अब इस को क्या कहूँ?”
पत्नी ने भी कंधे उचका कर उत्तर दिया:
“अब मैं क्या कहूँ?"
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(9). सुश्री राजेश कुमारी जी  
एहसान

गोपी के पिता रामवतार सेठ दीनानाथ के यहाँ ड्राइवर थे| गोपी और दीनानाथ का बेटा आयुष हम उम्र थे तथा सातवीं कक्षा में  पढ़ते थे  गोपी को सेठ दीनानाथ नेआयुष के ही स्कूल में दाखिला करवा दिया था| अपने बेटे की ही तरह उसको प्यार करते थे |दोनों बच्चे घर पर भी एक साथ ही खेलते थे| गोपी का परिवार सेठ की कृपा के आभार तले पूरी तरह दबा हुआ था |
गोपी पढ़ाई के साथ-साथ खेल कूद में भी आयुष से आगे था | जब भी वो दौड़ में आगे निकलता तो आयुष के चेहरे पर झुंझलाहट  दूर से दिखाई देती थी वो दो दिन उससे ठीक से बातें नहीं करता आयुष की माता के स्वभाव में भी फर्क आ जाता था  |
गोपी के पिता ने ये बात महसूस की तो गोपी को समझाया “कि  बेटा तुम्हारे हुनर पर कोई फर्क नहीं पडेगा  तुम जानबूझ कर थोड़ा धीरे दौड़ लिया करो  तुम्हारे पापा की नौकरी उनके हाथ में है और उनके एहसान हम नहीं भूल सकते” |
इसी दबाव में आकार न जाने कितनी प्रतियोगिताओं में गोपी जानबूझ  कर पिछड़ जाता फिर कई दिन तक गुमसुम रहता|
स्कूल में वार्षिक खेल कूद प्रतियोगिया का दिन आने वाला था  पहले तो गोपी ने नाम देने से मना कर दिया किन्तु टीचरों के कहने पर जबरदस्ती नाम देना पड़ा फिर उसने प्रेक्टिस भी बंद कर दी उसके पिता ये सब देख कर भी चुप थे |
आखिरकार वो दिन आ पहुँचा  पिता को पहली बार वहां  देख कर गोपी हैरान रह गया|  रामवतार जल्दी-जल्दी उसके पास पहुँच कर बोला “बेटा आज तुम्हें अपनी कसम से मुक्त करता हूँ  हिम्मत लगा कर दौड़ना आज तुम्हे प्रथम देखना चाहता हूँ” |
“किन्तु पापा अब आपकी नौकरी” ?? “वो सब बातें छोड़  तू  दौड़ बेटा दौड़”
गोपी निरुत्तर होकर पहेली सी  सुलझाता हुआ सा वापस दौड़ पड़ा  |
 “अब तक क्यों मैं इतना कमजोर था”?अपने दिल से ये सवाल करता हुआ  कल नयी नौकरी की तलाश में निकलना है इन सब बातों को गटक कर रामावतार नव ऊर्जा से भरे मैदान की तरफ दौड़ते अपने बेटे को देखता रहा|
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(10). श्री चंद्रेश कुमार छतलानी जी  
मैं गुलाम हूँ

देशभक्ति से ओतप्रोत एक समारोह से रात में लौटते हुए बेख्याली में उसकी कार किसी अनजाने रास्ते पर बढ़ने लगी, उसके दिमाग में यह स्वर गूँज रहा था, "शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले..."
तभी उसे सड़क के बीचों-बीच कुछ दूरी पर लकड़ियों का एक ढेर जलता हुआ दिखाई दिया, उसने हड़बड़ाहट में कार रोकी और वहां जाकर देखा। वह एक चिता थी, लेकिन आसपास कोई नहीं था। वह घबरा गया और चिल्लाया, "कोई है..."
एक क्षण की शांति के बाद उसे एक जोशीली आवाज़ सुनाई दी, "मैं हूँ भगत।"
"कौन भगत... कहाँ हो?"
"सरदार भगत सिंह हूँ, चिता में पड़ा हूँ... अकेला...कोई मेला नहीं है।"
वह और घबरा गया, उसने मरी हुई आवाज़ में कहा , "भगत सिंह! तुम्हें तो... सतलुज के पास जलाया गया था..."
"हाँ! सारे टुकड़े जल गए, लेकिन दिल की आग ठंडी नहीं हो रही... जहां जाता हूँ, ज़्यादा जल उठता है..."
"क्यों...?"
"पूर्ण स्वराज मिलेगा तब ही मेरी चिता ठंडी होगी।"
"लेकिन हम तो आज़ाद हैं।"
"क्या मेरे भाईयों को अब कोई भय नहीं? क्या हम सब एक हैं? क्या अब हम, सारे अंग्रेजी कपड़े और किताबें जला कर, उनके कैदी नहीं रहे? बोलो तो..."
वह कुछ कहता उससे पहले ही किसी ने उसे झिंझोड़ दिया। वह हड़बड़ा कर जागा। उसने देखा कि वह तो वहीँ समारोह कक्ष में है, उसके पास बैठे हुए मित्र ने उसे जगाया था और खड़े होने का इशारा कर रहा था।
वह खड़ा हुआ और अपने मित्र से सुस्त स्वर में पूछा,
"क्या अपनी जमीन पर दूसरों के कदमों का अनुसरण करने वाले लोग आज़ाद कहलाते हैं?"
मित्र ने उसे आश्चर्य से देखा और अपनी टाई ठीक कर राष्ट्रगान के लिए सावधान मुद्रा में खड़ा हो गया।
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(11). सुश्री सीमा सिंह जी  
अनुत्तरित प्रश्न


"प्लीज़, मॉम आज आप ऑफिस मत जाओ ना! हम दोनों साथ में घर पर ही खेलेंगे।" आज फिर नन्हे मोंटी ने ज़िद पकड़ ली थी।
मोहिता दफ्तर जाने की तैयारी भी कर रही थी और अपने सात वर्षीय इकलौते बेटे को समझाती भी जा रही थी।
"बेटा!आज मम्मा की इम्पोर्टेन्ट मीटिंग हैं आप डे केअर में रह जाओ,शाम को पापा आपको जल्दी पिक कर लेंगे।"
"आज स्कूल की छुट्टी है! वहाँ भी कोई नही होगा, मैं बोर हो जाऊंगा। प्लीज़ मम्मा!" बच्चे ने खुशामदी लहज़े में कहा।
"मैं नही रुक सकती बोला न! अच्छे बच्चे ज़िद नही करते। चलो अपना बैग और बॉटल उठाओ गाड़ी में बैठो, मैं आती हूँ।" मोहिता ने लैपटॉप पर से नज़र बिना हटाए, मोंटी को थोड़े सख्त स्वर में डपटते हुए कहा।
"मम्मा क्या मैं आज दादी के साथ घर पर रुक जाऊँ?" बच्चे ने सुबकते हुए आखरी दांव चला।
"क्या ज़िद है ये मोंटी?"
क्रोध से आपा खोती हुई मोहिता चीख उठी,
"तुमको नही पता है दादी माँ बीमार है वो अपना ख्याल भी नहीं रख सकती, उनकी आया तुम दोनों को नहीं सम्हाल सकती।"
"तो आप ऑफिस जाती ही क्यों हो? मेरे कितने फ्रेंड्स की मम्मा घर पर रहती हैं।" बच्चे ने रोष भरे स्वर में कहा और रो पड़ा। पोते का रोने का स्वर सुन बीमार दादी माँ भी बाहर निकल आई।
"क्या हुआ! मोंटी रो क्यों रहा है?" दादी माँ ने कमरे में दाखिल होते ही प्रश्न उछाला।
"देख लीजिए माँ, साहबज़ादे पूछ रहे हैं ऑफिस जाती ही क्यों हूँ?"
"अरे बच्चा है वो!" दादी माँ ने पोते का पक्ष ले लिया। पर मोहिता का बड़बड़ाना बदस्तूर जारी था।
" हम दोनों इतनी मेहनत, भाग दौड़ इसी के लिए तो करतें हैं जिस से इसको कल को किसी चीज़ की कमी न हो।"
" मगर जो उसका आज खो रहा है उसकी भरपाई कैसे करोगे तुम लोग?" ठंडी सांस छोड़ते हुए दादी माँ ने कहा। मगर तब तक सुबकता हुआ मोंटी कार में बैठ गया था।
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(12). श्री शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी  
हथरेटी-चकारेटी 

"लो, आज तुम जी भर के देख लो ये हथरेटी-चकारेटी वग़ैरह! इन्हीं से समझो कि क्या होती है चकरेटी, गुल्बी और छेन, कीला, पही!"
"ये तो इनके और इनके सामानों के नाम हैं, हमें तो इनकी कलाकारी देखनी है!" नेताजी की बात पर उन की पत्नी ने कहा और कुम्हारों को बड़ी लगन के साथ मटकियां, बर्तन और गुल्लक वग़ैरह बनाते देखने लगीं।
"बड़ा ही अद्भुत काम है यह! मिट्टी देखो, मिट्टी के गुल्ले देखो, चकरेटी से घुमाते चाक की गति देखो!" नेताजी अपनी पत्नी को यह सब पता नहीं क्यों दिखाना चाह रहे थे। कुम्हारों, उनकी पत्नियों और बच्चों की एक-एक गतिविधि को ध्यान से देख कर पत्नी बहुत आश्चर्य चकित हो रहीं थीं।
"अरे, उधर देखो, ये तो ठठेरे का काम भी करते हैं मिट्टी के बर्तनों पर!" पत्नी ने कहा।
"हाँ, चके पर बने बर्तन को पीट-पीट कर ये हवा व नमी निकाल कर उनको सही रूप देते हैं, फिर भट्टे में तपाकर उन्हें सुखाते-पकाते हैं!" यह कहते हुए, एक कुम्हार को साथ लेकर नेताजी पत्नी को भट्टे के नज़दीक़ ले गए, जहाँ से कुछ दूर तैयार बर्तन, मटके, गुल्लक वग़ैरह रखे हुए थे।
काफी देर तक सब कुछ देखने-समझने के बाद जब वे दोनों कार में वापस जाने लगे, तो दोनों कहीं खोये हुए थे। उनकी आँखों में कुम्हारों के चलते हाथ, चके की गति, उँगलियों की गतिविधियों और हथेलियों की थापों के दृश्य झूल रहे थे। पूरे परिवार की सहभागिता से वे अचंभित थे।
"कहाँ खो गई हो!" नेताजी ने पत्नी से पूछा।
"सोच रही हूँ कि काश तुम भी कुम्हार की तरह होते, तो अपने बेटे आज कुछ और होते!"
"मैं होता? कुम्हार जैसा तो तुम्हें होना चाहिए, घर में तुम्हारा काम है यह!"
"और तुम्हारा क्या काम है? सब कुछ औरतों के ही मत्थे क्यों?"
"बाप-दादाओं की दी हुई राजनीतिक विरासत कौन संभालेगा? परिवारवाद राजनीति में अब नहीं चल रहा? बेटों से क्या उम्मीद रखें?" नेताजी गंभीर होकर बोले।
"तो कुम्हारों के काम देखते वक्त भी क्या तुम राजनीति और देश के हालात में ही खोये हुए थे?" पत्नी ने नेताजी की टोपी सही करते हुए कहा।
"क्या ये भी अपने घर-परिवार नहीं हैं? इनके हथरेटी-चकारेटी कौन हैं?"
यह कहते हुए नेताजी के हाथ स्टिअरिंग पर कुम्हार की चकरेटी की तरह अनायास तेजी से चलने लगे।
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(13). सुश्री नीता कसार जी
ख़ून का रिश्ता
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" नर्तकी पर इतनी मेहरबानी क्यों महाराज ?हर नर्तकीपर आप इतने आभूषण तो नही लुटाते ?" रानी सुनयना ने रनिवास में राजा की आँखों में आँखे डालकर पूछ लिया।
"जानते है लोग क्या क्या बातें करते है,आपके पीठ पीछे ।
कहते है ,अब मेरा समय गया ।अब वह मेरी जगह लेगी,आपके दिल पर ही नही मुझ पर राज करेगी ।"
"आप भी कहाँ लोगों की बातों पर ध्यान देती है,रानीसाहिबा ,पर वह है तो,बला की खूबसूरत । गहने तो हम यूं ही लुटा दिया करते है।,पर हमारी प्रियतमा आप ही है,आप हमारा यक़ीन करिये,आपकी जगह कोई नही ले सकता ।" राजा ने अपनी कोशिशें जारी रखी।
"उस युवती को देख जाने कहाँ खो जाते है आप?" कहते हुये रानी ने राजा के मन को टटोलना चाहा।
"उसे देख पुराना ज़ख़्म हरा हो जाता है, हुबहू चेहरा आंखो के सामने आजाता है, लगता है उस लड़की से मेरा ख़ून का रिश्ता है,उसे देखकर मन मयूर ख़ुश हो जाता है । "कहते कहते
राजा की ख़ुशहाल सूरत गहन उदासी में बदल गई ।रानी को राजा की पूर्व प्रेयसी याद हो आई।
"कही वह अनारो और आपकी बेटी तो नही,ख़ून ने अपने ख़ून को पुकारा हो । " रानी के कहते ही राजा की आँखों के सामने अतीत के गहरे बादल छा गये ।
राजसी आंखो से गंगा जमुना बह निकली ।
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(14.) डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी 
अनुत्तरित प्रश्न 


‘क्या समझते हो, उसे अपनी बेरोजगारी से दुःख नहीं है . कौन जानता था कि  शादी के दो महीने बाद ही उसकी नौकरी छूट जायेगी . अरे इन प्राइवेट नौकरियों का भरोसा भी का है . देखो आज भैया आये तो रोज की तरह यह मत पूछना कि  क्या हुआ. तुम्हारे सवालों से तो वह और परेशान हो जाता है . उसे अहसास है की अब उस पर पत्नी की जिम्मेदारी भी है और तुम रोज-रोज वही सवाल पूंछ कर कोंचते रहते हो ‘- पत्नी ने पति को समझाते हुए कहा .
‘हम का करें, मगर जी नहीं मानता. जुबान से जुमला निकल ही जाता है.’ 
‘नाहीं खबरदार... जब लगने का होगा तो लग ही जावेगा. बहू को भी सुन सुनकर तकलीफ होती है. उसके खेलने-खाने के दिन हैं , कभी तो राम जी सुधि लेंगे .’
अचानक बाहर आहट हुयी. उनका बेटा रोजगार की तलाश में दिन भर थक=भटक कर हमेशा की तरह हताश –निराश शाम को घर वापस लौटा था . पिता ने आशा भरी आँखों से उसे देखा और हठात उसके मुख से फिर वही वाक्य निकला - ’कुछ काम बना, बेटा !’
यूँ तो हर रोज इस प्रश्न को सूना अनसुना कर वह अपने कमरे में चला जाता था .पर आज उसने आग्नेय नेत्रों से पिता की और देखा - ‘क्या ख़ाक बना ----और बनेगा कैसे ? बड़े-बड़े डिग्री वाले तलुए घिस रहे हैं तो हमारी क्या बिसात ? आज नौकरी और धंधा दोनों के लिए लाखों की दरकार है . हमारे पास क्या है ? तुमने जिदगी भर खटकर कौन सा महल खड़ा कर लिया ?’
‘चुप कर बेटा !’- माँ ने हस्तक्षेप करना चाहा- ‘ अपने बापू से तू यह क्या कह रहा है ?’
‘तो क्या गलत कह रहा हूँ . खुद तो जिदगी में कुछ ख़ास कर न सके और मुझ से जाने कौन सी उम्मीद लगाये बैठे हैं . जो कसर थी वह वियाह कर के पूरी कर दी . अब खिलाने की जिम्मेदाई मेरी  ---‘
अन्दर कमरे से बहू के सिसकियों की आवाज आयी . माँ की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे . उधर बेटे का आक्रोश आसमान छू रहा था – ‘मैं तो यह समझ ही नहीं पाता की आखिर आप लोगों  ने मुझे पैदा ही क्यों किया ?.’
‘चुप, बदतमीज----‘- माँ ने कांपते हुए कहा .
पिता का चेहरा क्षोभ से लाल हो गया. जुबान मानो तालू से चिपक गयी . आज उन्हें इस अनुत्तरित प्रश्न के दारुण दर्द की वास्तविक अनुभूति हुयी.  उनकी आँखों के सामने चालीस वर्ष पूर्व का एक दृश्य घूम गया . हठात ही उनके भाव-लोक में स्वर्गीय पिता का चेहरा नुमायाँ हुआ जो आज व्यंग्य से धीरे-धीरे मुस्करा रहा था .
----------------
(15). डॉ आशुतोष मिश्रा जी
अनुत्तरित प्रश्न

.
महिला दिवस की चर्चा हर जगह जोरों पर थी / नारी शक्ति के गुणगान की चर्चा करते लेखों , कहानियों और कविताओं से अखबार पटे पड़े थे लेकिन इस अवसर पर सर्वाधिक चर्चा का केंद्र बिंदु था विधायक ठाकुर राम सिंह  को महिला दिवस के मौके पर  मिलने वाले बिशिष्ट सम्मान की / रामलीला के विशाल मैदान में कार्यक्रम में शरीक होने के लिए सभी को आमंत्रित किया गया था / दीप प्रज्वलन और सरस्वती पूजा के कार्यक्रम को आगे बढाते हुए संचालक ने कहा “ अब  मैं बड़े सम्मान के साथ , जन जन के मसीहा , नारी उद्धारक , महान समाज सेवी , हम सबके बड़े भाई , माननीय विधायक ठाकुर राम सिंह जो ; जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश की आधी आवादी को खुशहाल बनाने , उन्हें स्वाभिमान के साथ जीने का हौसला देने और उनकी आर्थिक और सामाजिक उन्नति के लिए होम कर दिया; को श्रीफल और शाल से सम्मानित करते हुए दो शब्द बोलने के लिए आमंत्रित कर रहा हूँ “ ठाकुर राम सिंह जिंदाबाद , ठाकुर रामसिंह की जय हो “ पंडाल में चारों तरफ लोगों के सुर गूँज रहे थे / “ धन्यवाद , आप सब का जो आपने इस नाचीज को इस सम्मान  के लायक समझा” कहते हुए राम सिंह ने  पोडियम पर लगे माइक की तरफ बढ़ते सबका धन्यवाद ज्ञापित किया  लेकिन माइक हाथ में लेते ही जैसे ही उनकी नजर सामने की दीर्घा में बैठी अपने संगठन के एक दिवंगत कर्मचारी की बिधवा उर्मिल और उसके गोद में बैठे नन्हे मासूम पर पडी तो उन्हें मूसलाधार बरसात की रात में अपने तेज ज्वर से तपते पति की दवाई के लिए गिदगिड़ाती उर्मिला, उसके पति को डॉक्टर के यहाँ गाडी और ड्राईवर के साथ भेजने पर अता की गयी कीमत और उस मासूम बच्चे से अपने रिश्ता ..सब कुछ याद आ गया और उनके चेहरे का नूर उड़ने लगा/ उन्हें लगा जैसे किसी ने उनके पैरो तले से जमीन हटा दी हो / नारियों के मसीहा के रूप में आयोजित इस बिशिष्ट समारोह में उन्हें उर्मिला की आँखों में तैरते हुए दिख रहे थे कई अनुत्तरित प्रश्न ...ठाकुर राम सिंह क्या तुम मुझे अपनी पत्नी और इस मासूम को अपने बेटे का दर्जा दे सकोगे?
------------------------------------
(16). सुश्री सीमा मिश्रा जी 
.
"हैलो मम्मा, क्या कर रही हो?"
"ऑफिस में हूँ बेटा काम कर रही हूँ| तुमने जूस पिया? मैं शीला को कहकर आई थी बनाने के लिए"
"हाँ, पी लिया| मम्मा आप कह रही थी न शीला आंटी भी हमारे घर की मेंबर हैं वो सबका ध्यान रखती हैं|"
"हाँ, बेटा क्या बात है जल्दी बोलो, मुझे काम है|"
"आपने कहा था न जब बर्थडे होता है तो केक कटवाते हैं, गिफ्ट देते हैं|"
"हाँ-हाँ कहा था तो?"
"तो मम्मा, आज शीला आंटी का बर्थडे है| आप उनके लिए केक और गिफ्ट लाओगी न?"
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(17). श्री तेजवीर सिंह जी 
जिज्ञासा
.
भीष्म पितामह कुरुक्षेत्र के युद्ध में घायल होकर रणभूमि में शर शैया पर पड़े थे। श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों ही प्रतिदिन युद्ध समाप्त होने पर पितामह का कुशल क्षेम जानने जाते थे। अर्जुन से पितामह का कष्ट देखा नहीं जाता था। वह चाहता था कि पितामह को इस कष्ट से शीघ्र मुक्ति मिले। उसके मन में एक अपराध बोध जन्म ले चुका था क्योंकि पितामह की इस हालत का जिम्मेवार वह खुद को ही मानता था। उसकी इच्छा थी कि श्री कृष्ण, पितामह को अपना शरीर त्यागने को कहें, क्योंकि पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान था।
बार बार अर्जुन के आग्रह पर, श्री कृष्ण ने पितामह से निवेदन कर ही दिया,"पितामह, आपको जब अपना शरीर अपनी इच्छा से त्यागने का वरदान मिला हुआ है तो फ़िर आप यह कष्ट क्यों झेल रहे हो"?
"माधव, आपसे कौन सी बात छुपी है। आप तो सर्व ज्ञाता हो"।
"पितामह, यह जिज्ञासा मेरी नहीं, अपितु आपके प्रिय अर्जुन की है"।
"माधव, अर्जुन तो आपका भी प्रिय है। उसकी शंका का समाधान तो आप भी कर सकते हो"।
"नहीं पितामह, मेरी भी कुछ सीमायें हैं। विधि के विधान से अलग जाकर, किसी प्राणी के जीवन से जुड़े रहस्य, समय से पूर्व, मैं भी नहीं प्रकट कर सकता"।
"माधव, आप की तरह मुझे भी कुछ प्रतिबंधों का पालन करना होता है।मुझे भी अपने अतीत के अभिशप्त क्षणों की व्याख्या, अपनी भावी पीढ़ी के समक्ष करने की अनुमति नहीं है"।
"पितामह आपने बड़ी कुशलता से मेरे प्रश्न को उलझा दिया"।
"माधव, ऐसे जटिल प्रश्नों के समाधान का उत्तरदायित्व समय पर छोड़ देना ही न्यायसंगत होता है"। 
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(18). श्री लक्ष्मण रामानुज लडीवाला जी
दुर्भाग्य 

पिताजी का दफ्तर के कार्य से दिल्ली जाते समय ट्रेन में ह्रदय गति रुक जाने से देहांत हो जाने पर उनकी जगह १२वी पास बड़े लडके सुरेश को रजिस्ट्रार दफ्तर में नौकरी मिल गई | सामान्य जाति के होने के कारण उनके छोटे बेटे प्रकाश को एम् ए करने के बाद भी नौकरी नहीं मिली तो वह एक जोहरी की गद्दी  पर नौकरी करने लगा किन्तु वहां से कुछ  कम वेतन पर गुजारा नहीं हो पा रहा था | विवाह के पश्च्यात बड़े बेटे ने प्रथक रहने का निर्णय कर लिया | छोटे बेटे के पास माँ और बीबी-बच्चे की गृहस्थ का भार असहनीय होने पर घर में अशांति रहने लगी |

 सामाजिक दायित्व निभाने के भार पर माँ से तकरार पर छोटे बेटे प्रकाश ने कहाँ, माँ बड़े भैया सक्षम होने पर भी सामाजिक दायित्वों का खर्चा नहीं उठाते | माँ बोली - बेटा मै तो जिसके पास रहूंगी उसी को कहूँगी न | इस पर प्रकाश ने कहाँ – मेरा पिताजी की म्रत्यु पर दुर्भाग्य से मेरा अवयस्क होना और तेरे को साथ रहने का दण्ड भुगतना ही मेरे भाग्य में लिखा है तो ठीक है |
असहाय माँ दुखी मन से सुनकर चुप हो गयी |
---------------------------------------------------------
(19). योगराज प्रभाकर 
(रेल की पटरियाँ)

हर समय मुस्तैदी से एक दूसरे पर तनी हुई बंदूकें आज अलसाई सी नज़र आ रही थींI आज दोनों तरफ ही तनाव कुछ कम थाI अँधेरे ने दस्तक दी तो विशाल और ऊँची कांटेदार बाड़ के दोनों तरफ सीमा के दो प्रहरी कंधे पर भारी भरकम हथियार लटकाये गश्त लगाने को बढ़ेI सामने टोर्च की रौशनी फेंकते ही एक परिचित चेहरा दिखा तो इधर से एक आत्मीय स्वर उभरा:
“अरे इकबाल भाई सलाम! आ गए छुट्टी से?”
“नमस्ते पूरन भाई, आज सुबह ही लौटा हूँ गाँव सेI 2 महीने कैसे बीत गए पता ही नहीं चला” दूसरी तरफ से आने वाली आवाज़ में भी भरपूर आत्मीयता थीI
“कहिए, इस बार धान की फसल कैसी रही?”पूरन ने बातचीत का सिलिसिला आगे बढाए हुए पूछाI
“अल्लाह के फज़ल से इस बार फसल अच्छी हुई भाई!”
“हमारे यहाँ धान भी खूब हुआ और मंडी में कीमत भी अच्छी मिलीI”.
“शुक्र है अल्लाह काII और बताएँ घर में सब खैरियत?”  
“जी सब मज़े में हैं! अरे हाँ, मैं बात तो पूछना ही भूल गया! गुड्डी की तबियत कैसी है अब? मुझे उसकी बहुत चिंता हो रही थीI”
“वो अब बिल्कुल तंदरुस्त है,I आपने जो दवा भिजवाई थी उसने मेरी बच्ची बेटे को बचा लिया, वर्ना हम तो उसकी आस छोड़ चुके थेI”
“अरे ऐसे मत बोलिए भाई, मालिक उसको लम्बी उम्र बख्शे!
“मैं आपका ये एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूँगा पूरन भाई!”       
“आपस में एहसान कैसा? क्या मैं भूल सकता हूँ कि जब मेरे बेटे की नौकरी लगी थी तो आपने सबको मिठाई बाँट कर कितनी ख़ुशी मनाई थी?”  
“मनाता क्यों नहीं? तुम्हारा बेटा मेरा कुछ नहीं लगता क्या?” शिकायती लहजे में इकबाल ने कहाII   
“अब मैं क्या कहूँ इकबाल भाई?” थोडा झेंपते हुए पूरन ने कहाI  
“अच्छा ये सब छोड़ें! मेरे जानने वाले कुछ लोग हमारे पुश्तैनी शहर अम्बाला जा रहे हैं, कहिए आपके लिए क्या भिजवाऊँ?” इकबाल के स्वर में गज़ब का उत्साह थाII
पुश्तैनी शब्द सुनते ही पूरन के चेहरे पर अचानक मुस्कुराहट दौड़ गई, उसने बाड़ के थोडा पास आते हुए कहा:   
“एक बार मैंने बताया था कि ननकाना साहिब हमारे पुरखों की नगरी है, याद है?”
“जी जी, बिलकुल याद है पूरन भाईII”
“पता नहीं वहाँ जाना कभी नसीब हो कि न हो, अगर हो सके तो वहाँ की थोड़ी सी sमिट्टी भिजवा देनाII”
भरे गले से पूरन ने कहाI 
इक़बाल ने सिर हिलाकर मौन स्वीकृति देते हुए मीलों लम्बी कंटीली बाड़ पर निगाह डाली और उदास स्वर में पूछा:
“ये फासले कभी मिटेंगे भी क्या?”
एक ठण्डी आह भरते हुए पूरन ने उत्तर दिया:I
“ऊपर वाला ही जाने भाईI”
-----------------------------------------------
(20). श्री महेंद्र कुमार जी 
दो तलवारों वाली म्यान


फूल पर बैठी हुई तितली को बहुत देर से देख रहे माली ने पकड़ लिया। तितली छटपटाने लगी।
"तुम्हारी छोटी सी बच्ची भूस्खलन में मारी गयी पर तुम्हारा ईश्वर उसे बचा न सका। तुम्हारी बीवी, जो रोज इस मन्दिर में फूल पहुँचाती थी, की अस्मत पुजारी ने मन्दिर के अन्दर ही लूट ली और तुम्हारा ईश्वर देखता रहा। उस बेचारी ने कुएँ में कूद कर जान दे दी मगर वह कुछ न कर सका। क्या तुम्हें अब भी लगता है कि ईश्वर सर्वशक्तिशाली है?" उसे उस भिखारी की बात याद आ गयी जो मन्दिर के बाहर बैठता था।
उसने उस फूल को देखा जिस पर तितली बैठी हुई थी। फिर उसे तोड़ा और मसल कर वहीं ज़मीन पर फेंक दिया।
"यदि ऐसा नहीं है तो उसने ये सब रोक क्यों नहीं लिया? क्या वह चाहता था कि ये सब हो? यदि हाँ तो इसका मतलब यह हुआ कि वह दयालु नहीं है।" भिखारी के शब्द पुनः उसके कान में गूँजने लगे।
उसने तितली की तरफ देखा और उससे वही प्रश्न पूछा जो आख़िर में उस भिखारी ने उससे पूछा था, "ईश्वर एक साथ दयालु और सर्वशक्तिशाली कैसे हो सकता है?" तितली चुप थी।
उसने तितली के दोनों पर एक-एक कर नोंच डाले और उसे उस कुएँ में ले जा कर फेंक दिया जहाँ उसने पुजारी को मार कर डाल दिया था।
-----------------------------------------------
(21) श्री  विनय कुमार जी 
अनकहे सवाल
.
सुबह से ही उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था, कितने ही प्रकार की आशंका उसके मन में उमड़ घुमड़ रही थी| रह रह कर उसके दिमाग में उसके मित्र की बात आ रही थी "सिर्फ सही लिख देने से ही नहीं हो जाता सब कुछ, और भी बहुत कुछ करना पड़ता है इसके लिए| वैसे तुम कहो तो कुछ बात करूँ मैं, रेट तो सबको पता है और सही आदमी को मैं जानता हूँ"| 
उसने सर हिलाकर इनकार कर दिया, कहना और भी बहुत कुछ चाह रहा था लेकिन उसने अपने अंदर ही जज्ब कर लिया| क्या इतनी जी तोड़ मेहनत उसने इसीलिए की थी कि अंत में यह भी करना पड़े, पैसे तो वैसे भी नहीं थे उसके पास| 
दोपहर जैसे जैसे नजदीक आ रही थी, उसका घर में रहना कठिन होने लगा| एक तो माँ की नजर हमेशा कुछ सवाल करती रहती थी, हालाँकि कहती कुछ भी नहीं थी वह| दूसरे कहीं भाभी से आमना सामना हो गया तो कुछ न कुछ सुनना ही पड़ जाता था| उसने वही पुरानी वाली जीन्स पहनी और फोन लेकर चुपचाप निकल गया, पता नहीं क्यों उसको लगने लगा था कि जब भी वह इस जीन्स को पहनता था, कुछ बेहतर होने की सम्भावना लगती थी|
अपनी पुरानी चाय की दूकान वाले अड्डे पर आकर वह बैठ गया और कब उसके पास चाय आ गयी और वह पी भी गया, उसे पता नहीं चला| चाय वाले ने उसको टोका "क्या बात है भैया, आज कुछ बोल नहीं रहे" तो उसने अपने आप को यथासंभव सामान्य करते हुए मुस्कुराने की नाकाम कोशिश की|
"कुछ नहीं चाचा, आज रिजल्ट है ना, उसी के चलते थोड़ा सोच रहा था", और उसने एक बार अपने फोन में समय देखा| अब तक तो रिजल्ट आ गया होगा, सोचकर उसका दिल बैठने लगा| अगर उसका नाम होता तो जरूर फोन आता, आज भी वह खुद रिजल्ट देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था| तभी फोन बजा, स्क्रीन पर दोस्त का ही नाम था, उसने तुरंत उठाया और बात करने लगा| 
कुछ ही मिनटों बाद वह सर झुकाये वापस जा रहा था, माँ की आँखों के सवालों का जवाब आज भी उसके पास नहीं था|
---------------------------
(22). (श्री वीरेन्द्र वीर मेहता जी)
मानसिकता, एक दृष्टिकोण
.
 "क्या मैं आप को आगे कहीं छोड़ सकता हूँ?" उसने कार ठीक उसके करीब रोकते हुए मीठी आवाज में कहा।
फ्लाईओवर के एक ओर खड़ी वह अक्सर लिफ्ट मांगती नजर आती थी और कई लोगों के अनुसार अपने लिए नित नए साथी ढूँढने का उसका ये सटीक तरीका था। अक्सर पत्नी के साथ की वजह से के वह चाहकर भी कभी उसे लिफ्ट नहीं दे पाया था लेकिन आज अकेले होने के कारण वह इस अवसर को खोना नहीं चाहता था।
"नेकी और पूछ पूछ!" कहते हुए वह उसे देख मुस्कराते हुए सीट पर विराजमान हो गयी।
"कहाँ तक जाएंगी आप?" कहते हुए उसने कार आगे बढ़ा दी।
"जहां आप ले चले।"
"तो क्या आप कुछ घंटो के लिए मेरा साथ पसंद करेंगी। कहते हुए उसे, उसके बारे में लोगों की राय एक दम सही लगी।
"तो आप मेरे साथ समय गुजारना चाहते हैं!" वह अनायास ही मुस्कराने लगी।
"अगर आपको एतराज न हो तो!"
"मुझे कोई एतराज नहीं, पर क्या मैं इससे पहले आप के फ़ोन से एक कॉल कर सकती हूँ।"
हाँ क्यों नहीं? कहते हुए उसने कुछ असमंजस में अपना 'आई फ़ोन' उसे थमा दिया।
"..... सखी, इस नंबर को देखकर तुम ये तो समझ ही रही होगी कि मैं इस समय तुम्हारे पति के साथ हूँ।" कुछ क्षण में ही उसने एक नंबर मिला बात भी शुरू कर दी थी। "तुम्हे याद है तुमने मुझे एक बार कहा था कि यदि पत्नी समर्पित और सच्चरित्र हो तो कोई कारण नहीं कि पति भटक जाएँ। और मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था क्योंकि मैं कभी नही समझ पायी कि मेरे पति ने 'वह सब' क्यों किया था?"
इसी बीच वह कार रोक, इस बदलते घटनाक्रम को समझने के प्रयास में फोन रिसीवर पर पत्नी की मनोस्थिति महसूस कर खुद को निष्क्रिय सा अनुभव करने लगा था।
"न चिंता मत करना सखी, मैं ऐसा कुछ नहीं करने जा रही जैसा लोग मेरे बारें में सोचते है और न ही मुझे तुम्हारे समर्पण पर कोई संदेह है, बस मैं तो....." अपनी बात पूरी करते हुए उसने एक जलती नजर सखी के पति पर गड़ा दी। "ये सोच रही हूँ कि पत्नी के पूर्णसमर्पित होने के बाद भी अगर पति भटकता है तो ये महज उसकी कामनाओं की दुर्बलता है या सदियों से नारी को भोग्या मान लेने की नर-मानसिकता।"
----------------------------------------------------
(23). श्री सतविन्द्र कुमार जी 
कहानी हर घर की
.
बेडरूम में घुसते ही सौम्या ने शान्तनु के हाथ से रिमोट छीना और उसकी ओर गर्दन झटकते हुए,"घर की कोई खबर नहीं और दुनियाँ की खबरें देख रहे हैं।"
अपने पसंदीदा टीवी सीरियल वाला चैनल लगाया और दिनभर के घरेलू घटनाक्रम की किताब खोल दी शान्तनु के आगे।शिकायत पे शिकायत।उसने सास , ननद , देवरानी और जेठानी किसी को नहीं बख्शा।अब तो देवर,जेठ और ससुर भी लपेटे में आ गए।
शान्तनु अनमने ही सही टीवी देख रहा था।उसकी बातें सुनते-सुनते बड़ी शालीनता से बोला,"ये टीवी सीरियल कितने पसन्द हैं लोगों को।इनकी कहानी बहुत भाती है।"
सौम्या ने कुछ शांत होते हुए कहा,"हां .. हाँ भाती है तो.."
वह मुस्कराया,"सारी की सारी कहानियाँ जॉइंट फैमिली पर ही हैं।ऐसे परिवारों को सीरियल्स में तो सब चाहते हैं,पर खुद की जिंदगी में जानें कोई क्यों नहीं चाहता?"
सौम्या यह सुन धक्क से रह गई और तैश में आकर रिमोट वापिस शान्तनु की ओर फेंक दिया।
------------------------------------------------------------
(इस बार कोई भी रचना निरस्त नहीं की गई है, अत: यदि कोई रचना भूलवश छूट गई हो तो अविलम्ब सूचित करें)

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Replies to This Discussion

हर बार की तरह इस बार भी त्वरित संकलन हेतु सादर आभार आदरणीय योगराज प्रभाकर जी सर|

दिल से शुक्रिया भाई चंद्रेश कुमार छतलानी जी. 

 आदरणीय सर, 

 निवेदन है कि मेरी रचना को संकलन में निम्नानुसार बदल देवें, सादर

मैं गुलाम हूँ

 

देशभक्ति से ओतप्रोत एक समारोह से रात में लौटते हुए बेख्याली में उसकी कार किसी अनजाने रास्ते पर बढ़ने लगी, उसके दिमाग में यह स्वर गूँज रहा था, "शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले..."

 

तभी उसे सड़क के बीचों-बीच कुछ दूरी पर लकड़ियों का एक ढेर जलता हुआ दिखाई दिया, उसने हड़बड़ाहट में कार रोकी और वहां जाकर देखा। वह एक चिता थी, लेकिन आसपास कोई नहीं था। वह घबरा गया और चिल्लाया, "कोई है..."

 

एक क्षण की शांति के बाद उसे एक जोशीली आवाज़ सुनाई दी, "मैं हूँ भगत।"

 

"कौन भगत... कहाँ हो?"

 

"सरदार भगत सिंह हूँ, चिता में पड़ा हूँ... अकेला...कोई मेला नहीं है।"

 

वह और घबरा गया, उसने मरी हुई आवाज़ में कहा , "भगत सिंह! तुम्हें तो... सतलुज के पास जलाया गया था..."

 

"हाँ! सारे टुकड़े जल गए, लेकिन दिल की आग ठंडी नहीं हो रही... जहां जाता हूँ, ज़्यादा जल उठता है..."

 

"क्यों...?"

 

"पूर्ण स्वराज मिलेगा तब ही मेरी चिता ठंडी होगी।"

 

"लेकिन हम तो आज़ाद हैं।"

 

"क्या मेरे भाईयों को अब कोई भय नहीं? क्या हम सब एक हैं? क्या अब हम, सारे अंग्रेजी कपड़े और किताबें जला कर, उनके कैदी नहीं रहे? बोलो तो..."

 

वह कुछ कहता उससे पहले ही किसी ने उसे झिंझोड़ दिया। वह हड़बड़ा कर जागा। उसने देखा कि वह तो वहीँ समारोह कक्ष में है, उसके पास बैठे हुए मित्र ने उसे जगाया था और खड़े होने का इशारा कर रहा था।

 

वह खड़ा हुआ और अपने मित्र से सुस्त स्वर में पूछा,

"क्या अपनी जमीन पर दूसरों के कदमों का अनुसरण करने वाले लोग आज़ाद कहलाते हैं?"

 

मित्र ने उसे आश्चर्य से देखा और अपनी टाई ठीक कर राष्ट्रगान के लिए सावधान मुद्रा में खड़ा हो गया।

बहुत सुंदर व सटीक लघुकथा हो गई है आदरणीय चंद्रेश जी.

यथा निवेदित तथा प्रतिस्थापित. .

बहुआयामी कथानक-स्कोप देते विषय पर आधारित गोष्ठी के टिप्पणियों/मार्गदर्शन युक्त सफल संचालन व बेहतरीन संकलन हेतु आदरणीय मंच संचालक महोदय व सभी सहभागी रचनाकारों को तहे दिल से बहुत बहुत बधाई। मेरी रचना को स्थान देने के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब।

मेरी जानकारी के अनुसार आदरणीय सतविंदर कुमार जी व आदरणीय वीरेन्द्र वीर मेहता जी की रचनाएँ संकलन में सम्मिलित नहीं हो पाई है!

रचना 'रेल की पटरी' के लेखक महोदय (संचालक) छूट/छोड़ा गया है!
आदरणीय डॉ चन्द्रेश कुमार छतलानी जी, आदरणीय ओम प्रकाश क्षत्रिय प्रकाश जी व आदरणीय विनय कुमार जी को बेहतरीन प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई।
जिस कथा पर ज्यादा प्रतिक्रिया हो, वह उतनी ज्यादा निखार पाती हैं. समझ में भी जल्दी आती है. शायद यही मेरी लघुकथा के साथ हुआ है. शुक्रियाशुक्रिया आदरणीय उस्मानी जी.
आदरणीय योगराज भाई साहब, प्रणाम.
त्वरित संकलन के लिए आप को ढेर सारी शुभकामनाएं. यह आप के आयोजन का आकर्षण है कि परीक्षा कार्य में व्यस्त होते हुए भी मैं ने इस में भाग लिया.
मेरी लघुकथा को मूल लघुकथा के स्थान पर प्रतिस्थापित करने की कृपा करे.
लघुकथा-- अनुत्तरित प्रश्न

टेबल लैंप के सामने पुस्तक रखते हुए पुत्र ने कहा , " पापाजी ! सर कल यह चित्रवाला पाठ पढ़ाएंगे. आप समझा दीजिए."
" लाओ ! यह तो बहुत सरल है. मैं समझा देता हूं."
फिर बारीबारी से चित्र पर हाथ रखते हुए बताया, " यह बीज है . इसे जमीन में बोया जाता है. यह अंकुरित होता है . पौधा बनता है . बड़ा होता है. पेड़ बनता है. इस में फूल आते हैं फिर फल लगते हैं." इस तरह पापा ने पाठ समझा दिया.
पुत्र की जिज्ञासा बढ़ी, "पापाजी ! पेड़ के बीज से पेड़ पैदा होता है ?"
" हां."
" मुर्गी अंडे देती है . उस से मुर्गी के बच्चे निकलते हैं," उसने मासूमसा सवाल पूछा.
" हां."
" तो पापाजी, यह बताइए कि हम कैसे पैदा होते हैं ?"
यह प्रश्न सुन कर पापाजी चकरा गए. कुछ नहीं सुझा . क्या कहूं ? क्या जवाब दूं ? कैसे जवाब दूं ?
बस दिमाग में यह प्रश्न घूम ने लगा, " हम कैसे पैदा होते है ?"
पुत्र के सवाल ने पापाजी को बगलें झाँकने पर विवश कर दिया. पुत्र ने पापाजी को मौन देख कर अपना प्रश्न पुन: दोहराया दिया. पापाजी ने सामने बैठी पत्नी की ओर देखा और आँखों ही आँखों में उस से पूछा, “अब इस को क्या कहूँ?”
पत्नी ने भी कंधे उचका कर उत्तर दिया, “अब मैं क्या कहूँ?"

यथा निवेदित तथा प्रतिस्थापित. .

मुहतरम जनाब योगराज साहिब ,ओ बी ओ लघु कथा गोष्टी अंक 24के त्वरित संकलन और कामयाब संचालन के लिए मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं

बहुत बहुत शुक्रिया आ० तसदीक़ अहमद खान साहिब. सच कहूं तो इस बार की गोष्ठी में आपकी नाम रही.   

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