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उनकी ज़फ़ा का हमको, क्यूँ ऐतबार आये |
वो आज-कल खफा हैं, दिल कैसे मान जाए ||
माना की आज-कल वो, कुछ दूर हो गए हैं |
हम जानतें हैं की वो, मजबूर हो गए हैं ||
रुसवाइयों के डर से, वो रुख को है छुपाये | वो आज-कल खफा हैं
जो दिल तड़प रहा है, वो ज़रूर होंगे गम में |
जो समझ रहें हैं हमको, वो ज़रूर होंगें हममें ||
साए में आँसुओं के, हम कैसे मुस्कराएँ | वो आज-कल खफा हैं
ऐ दिल उदास न हो, अभी कुछ हुआ नहीं है |
क्यूँ कर रहा यकीं है, असर-ए-दुआ दुआ नहीं है ||
कुछ हादसों की खातिर, क्यूँ दिल 'शशि' जलायें|वो आज-कल खफा हैं

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 12, 2011 at 9:33pm
अच्छी रचना |

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