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घर वो होता है -- डॉo विजय शंकर

घर वो होता है ,
जहां आपका सदैव
इन्तजार होता है ।
जहां आप जाते नहीं ,
आप , जहां भी जाते हैं ,
वहीँ से जाते हैं ।
घर न दूर होता है , न पास होता है ,
जहां से हम सारी दूरियां नापते हैं ,
घर वो होता है ।
घर वो होता है,
जहां माँ होती है ,
जहां से माँ आपको कहीं भी भेजे ,
आपका इन्तजार वहीँ करती होती है ।
माँ जननी होती है , जनम देती है ,
धरती पर लाती है , माँ घर बनाती है ,
माँ ही घर देती है ,जब तक माँ होती है ,
अपने सब बच्चों को ,
बांधे रहती है, जोड़े रहती है,
घर को बिखरने से रोके रहती है |
घर वो होता है ,
एक बार जो घर छूट जाये ,
एक बार जो घर टूट जाये ,
तो वो घर , फिर कहीं नहीं होता है ॥
बस , मन में होता है ,
दिल में होता है ,
यादों में होता है ,
पर हमेशा होता हैं ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 860

Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on December 11, 2014 at 5:01am
प्रशस्ति के लिए धन्यवाद आदरणीय सलीम शेख जी ।
Comment by saalim sheikh on December 10, 2014 at 10:12pm

खूबसूरत नज़्म 

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 10, 2014 at 9:09pm
Thank you very much dear Somesh ji , for liking the poem and accepting the views therein .
Regards .
Comment by somesh kumar on December 10, 2014 at 8:26pm

home the sweet home ! and it is mother who makes it complete ,good creation with beautiful meaning

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 10, 2014 at 7:51pm
Thank you Dear naval ji , thanks for liking the lines written and posted by me , the credit of all these lines entirely goes to you . And that is the beauty of your own poem, " न जाने क्यों " which inspired me instantly to compose it . With regards n good wishes .
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 10, 2014 at 7:43pm
आदरणीय योगराज प्रभाकर जी आपको रचना के भाव अच्छे लगे , आभार। वास्तव में यह एक तात्कालित (instant ) रचना है जो अपने ही साथी नवल किशोर सोनी जी की " न जाने क्यों " शीर्षक से लिखी एवं प्रस्तुत रचना को पढ़ते ही लिख कर पोस्ट कर दी गयी , इसमें कवित्त पर ध्यान कम , भाव पर अधिक गया। बस।
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 10, 2014 at 7:32pm
रचना को स्वीकृति प्रदान करने हेतु आभार , बधाई के लिए सादर धन्यवाद आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी।
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 10, 2014 at 7:29pm
प्रिय जीतेन्द्र जी , रचना के भाव आपको प्रभावित कर सके , यही इनका महत्व है , बधाई के लिए सादर धन्यवाद।
Comment by Naval Kishor Soni on December 10, 2014 at 7:03pm

Congratulation sir....................Really nice one


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 10, 2014 at 3:46pm

गद्यात्मक शैली में भावपूर्ण रचना कही है आ० डॉ विजय शंकर जी। लेकिन कविता वाला लालित्य इसमें कहीं गुम लग रहा है।

कृपया ध्यान दे...

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