For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

कितना तुमको जीना है //रवि प्रकाश (Kitna Tumko Jeena Hai By Ravi Prakash)

सदियाँ बीत गई हैं फिर भी,जीने का आधार नहीं;
धड़कन लीक बदलती है पर,सांसों में आभार वही।
गरमी के खेमे उठ जाते,अगले पल में रिमझिम है;
जग के झूठे व्यापारों में,परिवर्तन ही अन्तिम है।
दुख की दीवारें पक्की हैं,सुख का परदा झीना है।
अपने में ही सब कुछ हो कर,कितना तुमको जीना है॥
सागर होना बहुत सरल है,नदिया बन गाना मुश्किल;
शिखरों सा उठना संभव है,गल कर बह जाना मुश्किल।
छाले भी सहलाने होंगे,गिरती-पड़ती राहें हैं;
सुर में गा पाना बहुत कठिन,स्वर में तपती आहें हैं।
पीड़ा की चिरती चादर को,हिचकी से क्यों सीना है।
अपने में ही सब कुछ हो कर,कितना तुमको जीना है॥
रोज़ कुँआ पी जाते लेकिन,झील आ खड़ी होती है;
धारा में बह जाते लेकिन,थकन वहाँ भी होती है।
एक स्वप्न भूशायी होता,कितने उगते आते हैं;
मिट्टी में आस नहीं मिलती,प्राण मगर मिल जाते हैं।
अधरों के द्वार खड़ा प्याला,जग ने अक्सर छीना है।
अपने में ही सब कुछ हो कर,कितना तुमको जीना है॥
दम भर में ओझल हो जाए,हम जिसका दम भरते हैं;
पल-पल जितना जी लेते हैं,पल-पल उतना मरते हैं।
किसकी छत पर छाया लेटे,किसको दर पे धूप मिले;
चलती दुनिया की चालों में,कितने ही बहरूप मिले।
मंज़िल का चाव नहीं सच्चा,रस्ता और पसीना है।
अपने में ही सब कुछ हो कर,कितना तुमको जीना है॥
कुछ भी निश्चित नहीं यहाँ पर,कौन कहाँ तक जाएगा;
पथ के फेरों से आतंकित,पथिक कहाँ थक जाएगा।
चिंगारी पर गिरते-गिरते,कितनी देर मचल पाओ;
आमंत्रण ख़त्म नहीं होते,जितनी दूर निकल जाओ।
जाने कितनी झनकारों में,बजती मन की वीना है।
अपने में ही सब कुछ हो कर,कितना तुमको जीना है॥
हवा झरोखों से बहने दो,घर के वातायन खोलो;
तिल-तिल जो गलता जाता है,अंतर में उसे टटोलो।
ग़ज़लों की बहरों में रच कर,कविता तुमको गानी है;
तुम पर मिटने को आतुर है,उसकी धड़कन पानी है।
फिर डगर तुम्हारी बाँहें हैं,नगर तुम्हारा सीना है।
अपने में ही सब कुछ हो कर,कितना तुमको जीना है॥

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 919

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 16, 2013 at 8:36pm

वाह वाह, बहुत ही अच्छी रचना हुई हैं, दो दो पक्तियों में समेटे गए भाव बहुत ही गहरे हैं, कुछ पद तो गहराई तक उतरते  चले जाते हैं, उन्ही में एक पद है ....

किसकी छत पर छाया लेटे,किसको दर पे धूप मिले;
चलती दुनिया की चालों में,कितने ही बहरूप मिले।

इस खुबसूरत कृति पर कवि को अनेकानेक बधाइयाँ । 

Comment by वेदिका on July 16, 2013 at 1:05pm

बहुत बहुत ही खूब सूरत और सच की अभिव्यक्ति करती रचना पर बधाई स्वीकारे!!

Comment by Shyam Narain Verma on July 16, 2013 at 1:05pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..
Comment by Neeraj Nishchal on July 16, 2013 at 11:54am

bahut hi sundar aur bahut hi gahri kavita hai

 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
5 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Saturday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Jul 14
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service