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GAZAL ग़ज़ल by अज़ीज़ बेलगामी

 

ग़ज़ल
by
अज़ीज़ बेलगामी

 

हम समझते रहे हयात गयी
क्या खबर थी बस एक रात गयी


खान्खाहूँ से मैं निकल आया
अब वो महदूद काएनात गयी


क्या शिकायत मुक़द्दमा कैसा
जान ही जाए वारदात गयी


जम के बरसें गे जंग के बादल
के फिजाए मुज़ाकिरात गयी


बेसदा क्योँ न हों ये नक्कारे
मेरी आवाज़ शश जिहात गयी


खौफे पुरशिश की जो अमीन नहीं
यूं समझ लीजे वो हयात गयी


फिर उजालौं के दिन फिरे हैं अज़ीज़
लो अंधेरो तुम्हारी रात गयी

उर्दू शब्दौं का मतलब :

खान्खाहूँ = वो गुफाएं जहाँ  घर बार छोड़ कर इश्वर की याद में जीवन बिताया जाता है
महदूद = Limited
जाए वारदात = वारदात की जगह, वो जगह जहाँ हादसा हुवा हो;
फिजाए मुज़ाकिरात = मुजाकिरात का या बात चीत का माहौल; Dialogue का माहौल
शश जिहात = Six Derections ( दायें - बाएं  - आगे - पीछे - ऊपर - निचे )
खौफे पुरशिश = मौत के बाद अपने पालनहार के रु बरु हाज़िर होकर जीवन का हिसाब देने का डर;
अमीन = अमानतदार Custodian








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Comment

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Comment by Abhinav Arun on December 20, 2010 at 3:29pm
 बहुत खूब अज़ीज़ साहब आपकी ग़ज़ल को पढ़कर उस्तादों के हुनर का पता चलता है और नए अलफ़ाज़ से वाकिफियत भी बढ़ती है !! आपकी और पोस्टों का इंतज़ार रहेगा !
Comment by Azeez Belgaumi on December 20, 2010 at 2:52pm

Shukriya Anupana ji

Comment by Anupama on December 20, 2010 at 2:33pm

sundar!

Comment by Azeez Belgaumi on December 19, 2010 at 5:39pm

प्रीतम जी .. ख़ुशी हुई के आप को मेरी ग़ज़ल पसंद आई. शुक्रिया अदा करता हूँ. आप के आदेश का पालन ज़रूर होगा.. दुआओं में याद रख्खें. आप का भाई.. अज़ीज़ बेलगामी.

Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on December 19, 2010 at 5:19pm

हम समझते रहे हयात गयी
क्या खबर थी बस एक रात गयी

 

waah kya baat hai.....maja aa gaya padh kar....dil khush ho gaya.......bahut bahut badhai is gazal ke liye...aur aage aane wali Gazalon ke liye shubhkamnayen

Comment by Azeez Belgaumi on December 19, 2010 at 5:04pm

मोहतरम डॉ. संजय दानी जी ... आप की  पसंदीदगी का शुक्रिया... इश्वर आप की मोहब्बतौं में इजाफा करे .. आमीन

Comment by Azeez Belgaumi on December 19, 2010 at 5:00pm

मोहतरम हरजीत सिंह खालसा जी ... आप की इनायातौं का शुक्रिया... रब त'आला आप को खुश रख्खे.. आमीन

Comment by Azeez Belgaumi on December 19, 2010 at 4:58pm

अर्चना जी ... आप की नवाजिश का शुक्रिया अदा करता हूँ.

Comment by Dr. Sanjay dani on December 19, 2010 at 4:57pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल। मुबारक बाद।

Comment by Azeez Belgaumi on December 19, 2010 at 4:54pm

प्रिय श्री गणेश साहेब आदाब अर्ज़ करता हूँ: 
बहुत आभारी हूँ के आप ने इस अदना सी कोशिश को सराहा जिस से हिंदी भाषिक मित्रौं के बीच बैठ कर कुछ सीखने हौसला मिला. इसी के साथ ये बिन्ती भी करूँगा के आप मेरे हिंदी Transliteration पर ज़रूर नज़र रखें के कहीं किसी ग़लती के सबब किसीकी दिल शिकनी न हो जाए. पिछली बार मैं ने आप के नाम को लेकर गलती की थी. जिस के लिए आप ने मुझे ज़रूर
क्षमा कर दिया होगा.  जी हाँ! मैं आगे भी अपनी सीधी साधी गज़लौं के साथ हाज़िर होता रहूँगा.
एक बार और धन्यवाद.
आप का मित्र
अज़ीज़ बेलगामी
(बंगलूर)

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