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ग़ज़ल : अज़ीज़ बेलगामी

ग़ज़ल

अज़ीज़ बेलगामी

ग़म उठाना अब ज़रूरी हो गया
चैन पाना अब ज़रूरी हो गया

आफियत की ज़िन्दगी जीते रहे
चोट खाना अब ज़रूरी हो गया

गूँज उट्ठे जिस से सारी काएनात
वो तराना अब ज़रूरी हो गया

जारहिय्यत  के दबे एहसास का
सर उठाना अब ज़रूरी हो गया

अब करम पर कोई आमादा नहीं
दिल दुखाना अब ज़रूरी हो गया

साज़िशौं, रुस्वायियौं को दफ'अतन
भूल जाना अब ज़रूरी हो गया

खान्खाहौं से निकल कर आईये
सर कटाना अब ज़रूरी हो गया

मंजिले दरो रसन को देख कर
मुस्कुराना अब ज़रूरी होगया

बज़्म बोझल सी है उठिएगा अज़ीज़
गुनगुनाना अब ज़रूरी हो गया

आफियत= Safety ;
जारहिय्यत = aggressive होना;
खानखाह = वो गुफाएं जहाँ  घर बार छोड़ कर इश्वर की याद में जीवन बिताया जाता है
;

दारो रसन = सूली
और रस्सी (जो फँसी देने के लिए इस्तेमाल होते हैं )








Views: 598

Comment

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Comment by दुष्यंत सेवक on August 23, 2011 at 7:04pm
fully agreed with shesh dhar ji, kam shabd, sateek radeef aur kaafiye matlab behtareen ghazal aur yah uska sarvshresht udaharan...bahut khoob azeez sahab
Comment by Roli Pathak on August 23, 2011 at 5:02pm

खान्खाहौं से निकल कर आईये
सर कटना अब ज़रूरी हो गया
बहुत खूब सर ................उर्दू शब्दों के अर्थ बता कर आपने  हमारे  शब्द  कोष  में  वृद्धि  की  ही ,
साथ  ही  आपकी बेहतरीन रचना की  हम  सच्ची  दाद  दे  सके .....बहुत उम्दा........

Comment by Bhasker Agrawal on December 29, 2010 at 1:34pm
वाह !!!!
Comment by Azeez Belgaumi on December 29, 2010 at 11:11am
shukriya aap ki pasandeedagi ka Ganesh ji.... aap ne sahi kaha... typing mistake hui hai....

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 29, 2010 at 11:05am

अब करम पर कोई आमादा नहीं
दिल दुखाना अब ज़रूरी हो गया,

 

वाह जनाब वाह, बेहतरीन कारीगरी, बहुत बढ़िया ....

खान्खाहौं से निकल कर आईये
सर कटना अब ज़रूरी हो गया,

ऊपर लिखे शे'र के मिसरा सानी मे लग रहा है टाइपिंग mistake है "कटाना" शायद होना चाहिये |

Comment by Rash Bihari Ravi on December 28, 2010 at 1:41pm
bahut badhiaa khubsurat
Comment by Lata R.Ojha on December 27, 2010 at 1:44pm

खान्खाहौं से निकल कर आईये
सर कटना अब ज़रूरी हो गया

 

वाह ! बहुत खूब अज़ीज़ जी .

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