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राहों की इन मुश्किलों से,इंसा तू न डर । 

पानी है तुझे मंजिल,हिम्मत तो ज़रा कर ।।

कि जाना है तुझे अभी,फ़लक से भी आगे । 

दुनिया ये सारी फिर,पीछे तेरे भागे ।।

छोटी-छोटी हारों से,ना खुद को दुखी कर ।

पानी है तुझे मंजिल,हिम्मत तो ज़रा कर ।।

छोटे व्यवधानों से,हिम्मत तेरी भागी ।

ये तो हैं कंकर,अभी चट्टान है बाकी ।।

जाएंगे बन पुष्प,तेरी राहों के पत्थर ।

पानी है तुझे मंज़िल,हिम्मत तो ज़रा कर ।।

माना दूर है बहुत,तेरी मंज़िल तो क्या ।

मुश्किलों से भरा हुआ,पूरा सफ़र तो क्या ।।

अपने तन और मन को,तू हौसलों से भर ।

पानी है तुझे मंजिल,हिम्मत तो ज़रा कर ।।

- प्रशांत दीक्षित
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by प्रशांत दीक्षित 'सागर' on October 11, 2019 at 10:06pm
बहुत-बहुत धन्यवाद आपका ।आपकी सराहना से बल मिला है । अभी-अभी बस लिखना चालू किया है और अभी सीख रहा हूँ,इसलिए विधाओं के बारे में ज्यादा नहीं जानता । मेरी इस कविता में मैंने प्रत्येक पंक्ती में 24 मात्राएँ रखी हैं । इसकी पहली दो पंक्तियाँ छोड़कर शेष तो रोला छंद में हैं । आशा है आपका सबका आशीर्वाद जरूर मिलेगा । और जो कमियां हैं वो मुझे मालूम चलेंगी ।
Comment by Samar kabeer on October 11, 2019 at 8:25pm

जनाब प्रशांत दीक्षित जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

एक निवेदन ये कि कृपया रचना के साथ उसकी विधा भी लिख दिया करें,इससे पाठकों को अपने विचार रखने में आसानी होती है ।

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