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प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत''s Blog (9)

धूल में खेले हुए (गज़ल)

धूल में खेले हुए, कितने ज़माने हो गए।

ये पता ही ना चला, कब हम सयाने हो गए।।

अब मुहल्ले में नई, दास्तान हैं बनने लगीं।

इश्क़ के किस्से सभी मेरे, पुराने हो गए।।

शब्द कुछ यूँ ही पिरोकर, इक बहर में रख लिए।

आपके होंठों से…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on May 10, 2023 at 10:19pm — 5 Comments

वीर जवान

फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

2122   2122 2122

धमनियों में दौड़ता यूँ तो सदा है ।।

रक्त है जो देश हित में खोलता है ।।

हौसला उस वीर का देखो ज़रा तुम ।

गोलियों की धार में सीना तना है ।।…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on January 25, 2020 at 5:33pm — 3 Comments

वाह ख़ुदा ! क्या तेरी कुदरत है(मुक्तछंद) -"सागर"

वाह ख़ुदा ! क्या तेरी कुदरत है,

कहीं है चैन-ओ-सुकून,तो कहीं मुसीबत है,

वाह ख़ुदा ! क्या तेरी कुदरत है । 

क्या था ख्याल तेरा,

बनाया किसी को गूंगा,किसी को बहरा,

बनाया तूने किसी को सबल-सुअंग,…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on October 28, 2019 at 12:00pm — 2 Comments

लघुकथा-दीवाली के पटाखे

दीपावली का दिन लगभग 3:00 बजे शाम के पूजन की तैयारियां चल रही थी । माँ किचन में खीर बना रही थी,तो हमारी धर्मपत्नी जी आंगन में रंगोली डाल रही थी । मैं हॉल में बैठा हुआ व्हाट्सएप पर लोगों को दिवाली की शुभकामनाएं भेज रहा था और मेरे पिताजी,मेरे पुत्र(भैय्यू),जिसने पिछले महीने अपना तीसरा जन्म दिन मनाया था,के साथ मस्ती करने में व्यस्त थे। इस मौसम में आमतौर पर मच्छर बहुत होते हैं,इसलिए पिताजी यह भी ख़याल रख रहे थे कि भैय्यू को मच्छर न कांटें और इसके लिए उन्हें काफ़ी मसक्कत भी करनी पड़ रही थी । तभी मेरा…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on October 27, 2019 at 10:23pm — 5 Comments

याद उनको कभी,मेरी आती नहीं

212 212 212 212

याद उसको कभी,मेरी आती नहीं ।

और ख्वाबों से मेरे,वो जाती नहीं ।।

सो रही अब भी वो, चैन से रात भर…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on October 19, 2019 at 10:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल - चरागाँ इक मुहब्बत का जला दो तुम

1222 1222 1222

चरागाँ इक मुहब्बत का जला दो तुम,

अभी उन्वान रिश्ते को नया दो तुम ।

फ़ना ही हो गये जो इश्क़ कर बैठे,

ज़हर है ये,ज़हर ही तो पिला दो तुम ।

हया कायम रहे,कब तक मुहब्बत में,

ज़रा पर्दा शराफत का उठा दो तुम…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on October 17, 2019 at 8:44pm — 6 Comments

कविता(मुक्तछंद) - डटे रहो

डटे रहो तुम अपने पथ पर,

इक दिन दुनिया ये डोलेगी ।

जल,थल और आकाश में जनता,

तेरी ही बोली बोलेगी ।।

कभी डरो ना असफलता से,

स्वाद तुम्हें जो जीत का चखना ।

व्यंग्य करें कितने ही…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on October 13, 2019 at 6:19pm — 1 Comment

ग़ज़ल- ज़िन्दगी में

2212 122 2212 122

थम ही नहीं रही है,रफ़्तार ज़िन्दगी में ।

हर दर्द की दवा है,बस प्यार ज़िन्दगी में ।।

बैठो न चुप दबाके, तुम राज़ सारे दिल के ।

जज़्बात का ज़रूरी,इज़हार ज़िन्दगी में ।।

माशूक़ से कलह का,यूं ग़म न कीजियेगा…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on October 12, 2019 at 9:00pm — 2 Comments

कविता-हिम्मत तो ज़रा कर

राहों की इन मुश्किलों से,इंसा तू न डर । 

पानी है तुझे मंजिल,हिम्मत तो ज़रा कर ।।

कि जाना है तुझे अभी,फ़लक से भी आगे । 

दुनिया ये सारी फिर,पीछे तेरे भागे ।।

छोटी-छोटी हारों से,ना खुद को दुखी कर ।

पानी है…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on October 10, 2019 at 10:30pm — 2 Comments

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