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अहसास की ग़ज़ल -मनोज अहसास

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मंजिल भी थी, चराग भी थे ,हौसला न था ।
अब सबसे कह रहा हूं ,उधर रास्ता न था ।

यह किसकी दस्तरस में धुँआ है मेरी सहर,
कल शब तो इस मकां में दिया भी जला न था।

लेकर चला रकीब मुझे तेरी राह पर,
इक शख्स बस वही था जो मुझसे खफा न था।

मुद्दत के बाद भी तेरी तस्वीर दिल में है,
तेरा फरेब तेरे करम से बड़ा न था ।

उसके जवाब में थे कई उंगलियों के रंग,
लगता है उसने खत मेरा पूरा पढ़ा न था ।

बदले में उसको लात ही मिलनी जरूर थी,
सारा नगर जला था घर उसका जलाना था।

मेरे कलाम में कई अशआर वे भी थे,
जिनका सही इशारा मुझे भी पता न था।

दीदार की तलब तो थी, मिलने का दम नहीं,
दरवाजा तो खुला था दरीचा खुला न था।

गिरते को देखकर गिरे कुछ लोग राह में,
वो बच गया था क्योंकि उधर देखता न था।

तक्सीम कर गया कोई ऐसे मेरा वजूद,
अहलो -अयाल के लिए कुछ भी बचा न था।

जिसको जमाने वालों ने किस्मत कहा मेरी,
उसके वरक पे मैंने कभी कुछ लिखा न था ।

'अहसास' ये सज़ा है या तौफ़ीक़ या सनक,
मैं शेर लिख रहा था, कोई जागता न था।

मौलिक और अप्रकाशित

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