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ग़ज़ल(ग़ज़ल बेबहर है...)

122  122  122  122

गजल बेबहर है, नदी बिन लहर है
कहो,क्या करूँ जब बिखरता जहर है?1

कहूँ क्या भला मैं? सुनेगा न कोई,
हुआ हादसा,मौन सारा शहर है।2

बचेगी नहीं लाज समझा करो तुम
बहकती यहां की हवा हर पहर है।3

गिनूँ क्या सितम गैर से जो मिले
मिले दर्द घर में, बड़ा ही कहर है।4

बुझाते रहे जो चिरागों को' अबतक
बताते कि होने को' अब तो सहर है।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on October 29, 2019 at 7:45am

आभार और नमन आदरणीय समर जी।

Comment by Samar kabeer on October 28, 2019 at 3:40pm

जनाब मनन कुमार जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

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