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माँ .....

सुनाता हूँ
स्वयं को
मैं तेरी ही लोरी माँ
पर
नींद नहीं आती

गुनगुनाता हूँ
तुझको
मैं आठों पहर
पर
तू नहीं आती

पहले तो तू
बिन कहे समझ जाती थी
अपने लाल की बात
अब तुझे क्यूँ
मेरी तड़प

नज़र नहीं आती

मेरे एक-एक आँसू पर
कभी
तेरी जान निकल जाती थी माँ
अब क्यूँ अपने पल्लू से
पोँछने मेरे आँसू
तू

तस्वीर से

निकल नहीं आती

माँ
मेरे सपने में आना
देखना मेरा बदन कितना तप रहा है
क्या मैं तेरे बिना
यूँ ही तपता रहूंगा
पहले की तरह
मुझे
क्यों दवाई

पिलाने नहीं आती

माँ बता न
तू क्यूँ नहीं आती , तू क्यूँ नहीं आती , ......


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 55

Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 14, 2019 at 6:41pm

आदरणीय  प्रशांत दीक्षित 'सागर जी सृजन में निहित भावुकता को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on October 14, 2019 at 6:40pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by प्रशांत दीक्षित 'सागर' on October 13, 2019 at 6:23pm

रचना पढ़ते समय,एक एक लब्ज़ का चित्रण हो रहा था,जैसे कि मैं अपनी माँ के ही साथ हूँ ।

Comment by Samar kabeer on October 13, 2019 at 2:59pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्द: कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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