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212 1212 1212 1212

सिर पे पांव रख हमारे,चढ़ रहे हो सीढ़ियाँ
फैंक दलदलों में यार,मांगते हो माफियाँ

जिंदगी में देख लीं,बहुत सी हमने आंधियाँ
खत्म हो चुके हैं अश्क,बंद सी हैं सिस्कियाँ

दास्ताने जिंदगी, सुना सके न हम कभी
दर खुदा के आ खड़े,ले चंद हम भी अर्जि़याँ

छा रही है तीरगी,न रोशनी दिखे कहीं
मौत है बुला रही,दे जिंदगी भी धमकियाँ

चापलूसी बोलती,न महनतों का मोल है
लग रही जगह जगह, इमान की ही बोलियाँ

साथ छोड़ चल दिये,मकान खाली हो गया
हो मुबारकें तुम्हें, नई तुम्हारी बस्तियाँ

बारिशों की है झडी,या अश्क को गरूर है
खेल कर वो आब से,डुबा रहें हैं कश्तियाँ

जिंदगी किताब सी खुली पडी थी सामने
किस्मतों के खेल हैं,बता रही थी गलतियाँ

बचपना,पुकारता है बेकरार मन मेरा
दोस्तों की भेड़ चाल, औऱ मौज मस्तियाँ

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on July 1, 2019 at 6:47pm

अब ठीक है ।

'बिक रही कलम लगी सुखनबरों की बोलियां'

इस मिसरे में 'सुखनबरों' को "सुखनवरों कर लें,'कलम' को "क़लम" कर लें ।

'बारिशों की है झडी,या अश्क को गुरूर है'

इस मिसरे में 'गुरुर' को "ग़ुरूर" लिखें ।

Comment by Rachna Bhatia on July 1, 2019 at 2:01pm
आदरणिय समर कबीर जी सुधार करने का प्रयास किया है।
कृपा मार्गदर्शनकरें

212 1212 1212 1212
सिर पे पांव रख हमारे,चढ़ रहे हो सीढ़ियाँ
क्यों गिरा के दलदलों में,मांगते मुआफियाँ

चापलूसी बोलती,न महनतों का मोल है
बिक रही कलम लगी सुखनबरों की बोलियां


बारिशों की है झडी,या अश्क को गुरूर है
खेल कर वो आब से,डुबा रहें हैं कश्तियाँ
Comment by Rachna Bhatia on July 1, 2019 at 10:59am
आदरणिय समर कबीर साहेब
प्रतिउत्तर देर से देने के लिए क्षमा चाहती हूँ
आगे से ऐसा नहीं होगा।

आदरणिय संज्ञान के लिए आपकी आभारी हूँ।
जी सुधार कर के आपको दुबारा दिखाती हूँ
Comment by Neelam Upadhyaya on June 12, 2019 at 2:50pm

आदरणीया रचना भाटिया जी, ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें । कृपया आदरणीय समर कबीर जी की टिपण्णी का संज्ञान लें।

Comment by Samar kabeer on June 11, 2019 at 6:24pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'फैंक दलदलों में यार,मांगते हो माफियाँ'

इस मिसरे में 'माफियाँ' ग़लत शब्द है,सहीह शब्द है "मुआफ़ी" और इसका बहुवचन होगा "मुआफ़ियाँ",मिसरा बदलने का प्रयास करें ।

'लग रही जगह जगह, इमान की ही बोलियाँ'

इस मिसरे में 'इमान' ग़लत शब्द है,सहीह शब्द है "ईमान"221,इसे बदलने का प्रयास करें ।

'बारिशों की है झडी,या अश्क को गरूर है'

इस मिसरे में 'गरूर' ग़लत शब्द है,सहीह शब्द है "ग़ुरूर" देखियेगा ।

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