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गज़ल - गमों का नाम हो जाये हमारे नाम से साकी।

पिला दे घूंट दो मुझको, ज़रा नजरों से ऐ साकी।।
मिलुंगा मैं तुझे हर मोड़ पे पहचान ले साकी।।१।।

अभी तो दिन भी बाकी है ये सूरज ही नहीं डूबा।
इसे दिलबर के आंचल में जरा छुप जान दे साकी।।२।।

जिसे पूजा किये हरदम जिसे समझा खुदा मैंने।
किया बर्बाद मुझको तो उसी इन्सान ने साकी।।३।।

मेरा महबूब भी तू है मेरा हमराज भी तू है।
वे दुश्मन थे मेरे पक्के जो मेरे साथ थे साकी।।४।।

नहीं इससे बड़ी कोई भी अब अपनी तमन्ना है।
गमों का नाम हो जाये हमारे नाम से साकी।।५।।

यकीनन दर्द मेरा उनको भी महसूस होता है।
सभी यूं ही नही पढते हमारे शैर ये साकी।।६।।

'अमित', अपनी कहानी मयकदे की आप बीती है।
दर औ दीवार रोते हैं हमारी बात पे साकी।।७।।

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Ravi Shukla on Monday

आदरणीय अमित जी ग़ज़ल की अच्छी कोशिश हुई है दिली मुबारकबाद पेश करता हूं आदरणीय समर कबीर साहब की इस्लाह से यकीनन हम सब को भी फायदा हुआ उसका संज्ञान लीजिये। सादर

Comment by सुचिसंदीप अग्रवालl on January 9, 2019 at 7:37pm

अमित भाई, समर कबीर जी के मशवरे के बाद गजल में चार चाँद लग गए हैं। एक एक ग़ज़ल की बारीकियों को देखकर उसकी गलतियों से अवगत कराना और फिर सुधारना सबके बस की बात नहीं होती। कबीर भाई जी की इस निष्ठा और आत्मीयता को नमन करती हूं।

Comment by सुचिसंदीप अग्रवालl on January 9, 2019 at 7:36pm

अमित भाई, समर कबीर जी के मशवरे के बाद गजल में चार चाँद लग गए हैं। एक एक ग़ज़ल की बारीकियों को देखकर उसकी गलतियों से अवगत कराना और फिर सुधारना सबके बस की बात नहीं होती। कबीर भाई जी की इस निष्ठा और आत्मीयता को नमन करती हूं।

Comment by Samar kabeer on January 8, 2019 at 2:53pm

जनाब अमित कुमार "अमित" जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

मिलुंगा मैं तुझे हर मोड़ पे पहचान ले साकी'

इस मिसरे में 'मिलुंगा' को "मिलूँगा" कर लें ।

' इसे दिलबर के आंचल में जरा छुप जान दे साकी'

इस मिसरे में व्याकरण ठीक नहीं 'चुप जान दे' सहीह व्याकरण है "छुप जाने दे" जो यहाँ बह्र की वजह से नहीं ले सकते,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'इसे दिलबर के आँचल में ज़रा छुपने दे ऐ साक़ी'

'जिसे पूजा किये हरदम जिसे समझा खुदा मैंने'

इस मिसरे में 'पूजा किये'बहुवचन है,इसलिए इसे 'पूजा किया' करना उचित होगा ।

'किया बर्बाद मुझको तो उसी इन्सान ने साकी'

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है,इसे यूँ कर लें तो ऐब निकल जायेगा:;

'किया बर्बाद मुझको तो उसी महबूब ने साक़ी'

' वे दुश्मन थे मेरे पक्के जो मेरे साथ थे साकी'

इस मिसरे में भी ऐब-ए-तनाफ़ुर है,इसे यूँ कर लें तो ऐब निकल जायेगा:-

'वही दुश्मन थे पक्के जो मेरे हमराह थे साक़ी'

'यकीनन दर्द मेरा उनको भी महसूस होता है।
सभी यूं ही नही पढते हमारे शैर ये साकी'

इस शैर में शुतरगुरबा दोष है,सानी मिसरा यूँ कर लें ऐब निकल जायेगा:-

'सभी यूँ ही नहीं पढ़ते मेरे अशआर ऐ साक़ी'

'अमित', अपनी कहानी मयकदे की आप बीती है।
दर औ दीवार रोते हैं हमारी बात पे साकी'

इस शैर के ऊला में आप 'अमित' को सम्बोधित कर रहे हैं,और सानी में 'साक़ी' को ये भी शुतरगुरबा दोष है,और सानी मिसरे में ऐब -ए-तनाफ़ुर भी है,इस शैर को यूँ कर लें,ऐब निकल जायेगा:-

'"अमित" की ये कहानी मयकदे की आप बीती है'

दर-ओ-दीवार हैं मातम कुनाँ इस बात पे साक़ी'

बाक़ी शुभ शुभ ।

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