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ग़ज़ल -प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।

2122 2122 2122 212


रोज के झगड़े, कलह से दिल अब उकता सा गया।
प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।

दफ़्न कर दी हर तमन्ना, हर दफ़ा,जब भी उठी
बारहा इस हादसे में रब्त पिसता सा गया।

रोज ही झगड़े किये, रोज ही तौब़ा किया
रफ़्ता रफ़्ता हमसे वो ऐसे बिछड़ता सा गया।

चाहकर भी कुछ न कर पाये अना के सामने
हाथ से दोनों ही के रिश्ता फिसलता सा गया।


छोडकर टेशन सनम को लब तो मुस्काते रहें
प्यार का मारा हमारा दिल तड़पता सा गया।

जाने किसकी बददुआ थी दरमियां हम दोनों के
जितना समझाया उसे उतना बिगडता सा गया।

खुदकुशी तो थी नहीं शामिल हमारे ख्वाबों में
मौत का पंजा ही जबरन हमको कसता सा गया।

मौलिक व अप्रकाशित ।

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Comment

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Comment by राज़ नवादवी on December 21, 2018 at 11:43am

आदरणीय राहुल दांगी जी, आदाब. ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें. बाक़ी आदरणीय समर कबीर साहब ने अपनी बहुमूल्य प्रक्रिया दे दी है. सादर 

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on December 19, 2018 at 9:05am

आदरणीय राहुल डांगी जी सुंदर रचना के लिए बधाई

Comment by Samar kabeer on December 17, 2018 at 9:21pm

जनाब राहुल डांगी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'रोज ही झगड़े किये, रोज ही तौब़ा किया'

पहली बात,ये मिसरा बह्र में नहीं है,दूसरी बात ये कि "तौबा" शब्द स्त्रीलिंग है ।

छोडकर टेशन सनम को लब तो मुस्काते रहें'

इस मिसरे में 'रहें' को "रहे" कर लें ।

Comment by PHOOL SINGH on December 17, 2018 at 2:51pm

वक्त की सच्चाई को उजागर करती सुंदर रचना बधाई स्वीकारे

कृपया ध्यान दे...

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