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ग़ज़ल-खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

2122 2122 2122 212

खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से
चाहो मत बढकर किसी को चाह की औकात से।

जिसकी ख़ातिर छोड़ दी दुनिया की सारी दौलतें
रख न पाया मन भी मेरा वो दो मीठी बात से ।

दे रहा है तुहमतें उल्टा मुझे ही बेवफ़ा 
बेहया से क्या कहूँ मैं, क्या कहूँ इस जात से।

मैं समझता था मुहब्बत की सभी को हैं तलब
उसको तो मतलब है लेकिन और कोई बात से।

हैं मुसलसल शिद्दतें कुछ यूँ जुदाई की सनम
छूटने ही वाला है अब हाथ तेरे हाथ से।

मौलिक व अप्रकाशित ।

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Comment by Rahul Dangi on December 5, 2018 at 10:37pm

शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2018 at 11:00am

आ. भाई राहुल जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Rahul Dangi on December 4, 2018 at 11:05pm

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब राज़ नवाजना साहब

Comment by राज़ नवादवी on December 3, 2018 at 7:25pm

आदरणीय राहुल डांगी साहब, आदाब. सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे हार्दिक बधाई. सादर. 

Comment by Rahul Dangi on December 2, 2018 at 3:52pm

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब समर साहब

Comment by Samar kabeer on December 2, 2018 at 8:38am

जनाब राहुल डांगी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'  दे रहा है तोहमत उलटा मुझे ही बेवफ़ा '

इस मिसरे में 'तोहमत'ग़लत है,सहीह शब्द है "तुहमत" 22,इस मिसरे को यूँ कर लें:-

'दे रहा है तुहमतें उल्टा मुझे ही बेवफ़ा'

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