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'इक दिन बिक जायेगा' (लघुकथा)

"अब तो सुधर जाओ! कुछ ही साल बचे हैं रिटायर होने में! औलाद के लिए कुछ तो ऊपरी कमाई कर लो, इंजीनियर साहब!"


"ठेकेदारी में तुम्हें जो करना है, करते रहो! मैं ह़राम की कमाई में यकीं नहीं रखता! जवान पढ़ी-लिखी औलाद अपने पैरों पर ख़ुद खड़ी हो ले या तुम लोगों माफ़िक अपना ईमान बेचकर 'होड़ और झूठ' की दुनिया में दाख़िल हो कर अपना स्टेटस बनाये-दिखाये; ये उनके ज़मीर पर है! मेहरबानी कर ये लिफ़ाफ़े आप ही आपस में बांट लें!"


".. तो पिछली बार की तरह एक लिफ़ाफ़ा बड़े साहब को ... और बाक़ी हमारे ही हिस्से में! हमेशा याद रखेंगें साहिब हम आपको!" एक वरिष्ठ ठेकेदार ने रुपयों के लिफ़ाफ़े समेटते हुए कहा - "दूसरों को गुनाह करने देना भी तो आपके ख़ुदा को पसंद नहीं। ख़ैर .. आज नहीं, तो कल आपका ईमान बिकेगा ही! भले आपकी औलाद की ख़ातिर या औलाद के ही ज़रिये! ज़मीर और ईमानदारी के 'क़िले' तक हमने ढहते देखे हैं!"


"लेकिन मिसालें ढहती-मिटती नहीं; बिकती भी नहीं! मिसालें, निशानियां सबक़ देती रहती हैं, ठेकेदार साहिब! इस दुनिया से लेकर और देकर क्या जाओगे?"


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 13, 2018 at 8:32pm

मेरी इस रचना पटल पर समय देकर अपने तत्संबंधी विचार सांझा करते हुए मेरी हौसला अफ़ज़ाई करने हेतु तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब और मुहतरमा बबीता गुप्ता साहिबा। सभी पाठकों (विउअर्ज़) को भी समय देने हेतु बहुत-बहुत शुक्रिया।

Comment by babitagupta on September 5, 2018 at 6:23pm

घूसखोरी लेने या ना लेने के मतभेद को दर्शाती रचना।हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय  शेख सरजी। 

Comment by Samar kabeer on September 2, 2018 at 2:34pm

जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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