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कैसे-कैसे सवालों का जवाब है जिंदगी कांटों के साथ-साथ गुलाब है जिंदगी

कैसे-कैसे सवालों का जवाब है जिंदगी

कांटों के साथ-साथ गुलाब है जिंदगी

तुम समझ सके न जिसे हम समझ सके

ऐसे मसाएलों का अजाब (दुख/संत्रास) है जिंदगी

शज़र (वृक्ष) की ओट में चांद ठहर गया है

चांदनी कह रही है, माहताब है जिंदगी

मेरे औ चांद के जो दरम्यान था

शज़र का हल्का सा नक़ाब है जिंदगी

तेरी मुस्कुराहटों, रुसवाईयों से अलग

भूख और गुरबतों का असबाब है जिंदगी

तू रहे कहीं, मुझ से जुदा रह नहीं सकती

गर मैं हूँ रिन्द (पियक्कड़) तो मानिए शराब है ज़िन्दगी

रातों को उतर सुबह को सूख जाए जो

आंखों का शबनमी सा ख्वाब है जिंदगी

कुछ रंग थे तुम्हारे, कुछ रंग थे हमारे

आकाश को नापते सुरखाब (कई रंग के पंखवाला पक्षी) है जिंदगी

गांवों में चहचहाते पंछी जहां मिलें

वो जोहड़, वो पोखर, वो तालाब है जिंदगी

हम से मिल सकोगे, हम तुम से मिल सकेंगे

कुछ ऐसी कशमकश का शबाब है जिंदगी

तुम जो मिल गए तो अच्छी है जिंदगी

वरना तय ही मानिए खराब है जिंदगी

सादर,

सुधेन्दु ओझा

मौलिक एवम अप्रकाशित।

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Comment

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Comment by babitagupta on August 15, 2018 at 3:46pm

उम्दा रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।

Comment by Mohammed Arif on August 14, 2018 at 8:02am

आदरणीय सुधेंदु ओझा जी आदाब,

                     ज़िंदगी को केंद्र में रखकर रची गई बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Samar kabeer on August 13, 2018 at 4:01pm

जनाब सुधेन्दु ओझा जी आदाब, अच्छी कविता हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

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