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ग़ज़ल (क्या ख़ता कोई रशके क़मर हो गई)

ग़ज़ल (क्या ख़ता कोई रशके क़मर हो गई)
(फाइ लुन _फाइ लुन _फाइ लुन _फाइ लुन)

क्या ख़ता कोई रशके क़मर हो गई |
जो खफा मुझसे तेरी नज़र हो गई |

आँख में तेरी अश्के नदामत न थे
इस लिए हर दुआ बे असर हो गई |

ग़म तबाही का तुमको नहीं है अगर
आँख क्यूँ देख कर मुझको तर हो गई |

ख़त्म शिकवे गिले सारे हो जाएंगे
गुफ्तगू उनसे तन्हा अगर हो गई |

यह करामत हमारे अज़ीज़ों की है
यूँ न उनकी अलग रह गुज़र हो गई |

तुहमते बे वफाई थी दोनों तरफ़
बदगुमानी इसी बात पर हो गई |

मुझको हैरत है उनसे मिला नीम शब
फ़िर भी तस्दीक सबको ख़बर हो गई |

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 31, 2018 at 8:38am

जनाब गुमनाम साहिब, ग़ज़ल पर आपकीखूबसूरत प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I  

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 31, 2018 at 7:30am

वाह खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई. .. .. सबको खबर हो गई . .. .वाह 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 30, 2018 at 9:27pm

मुह तरमा नीलम साहिबा, ग़ज़ल पर आपकी सुंदर प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by Neelam Upadhyaya on July 30, 2018 at 2:01pm

आदरणीय तस्दीक़ अहमद खान साहब, बेहतरीन ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए मुबारकबाड्ड कुबूल करें। 
" ग़म तबाही का तुमको नहीं है अगर
आँख क्यूँ देख कर मुझको तर हो गई |"

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 30, 2018 at 1:30pm

मुहतरम जनाब तेज वीर साहिब, ग़ज़ल पर आपकी खूबसूरत प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by TEJ VEER SINGH on July 30, 2018 at 12:22pm

हार्दिक बधाई आदरणीय तस्दीक अहमद खान साहब जी।बेहतरीन गज़ल।

ख़त्म शिकवे गिले सारे हो जाएंगे
गुफ्तगू उनसे तन्हा अगर हो गई |

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 30, 2018 at 8:17am

जनाब किशोर कांत साहिब, ग़ज़ल में आपकी शिर्कतऔर हौसला  अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by Kishorekant on July 30, 2018 at 12:56am

वाह, बहुत ही ऊम्दा ग़ज़ल !

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