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आलमे खयाल

(अतुकांत)

शाम बैठी रही हो कर तैयार वह दुलहन-सी

उदास.. मुन्तज़िर थी वह आज भी इश्क की

ज़रूर निराला ही होगा  यह आलमे तसव्वुर

दर पर हाँ एक हल्की-सी दस्तक तो हुई थी

पर वह जो आया था दर पर वह इश्क न था

फ़कत आलमे फ़ना था .. हवा का झोंका था

उसका क्या ? आया,  फ़ना कर के चला गया

आदतन किसी और दरवाज़े पर दस्तक देने

                   -------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

आलमे खयाल    = कल्पना जगत

आलमे तसव्वुर   = गूढ़ ध्यान का संसार

आलमे  फ़ना      =नश्वर जगत

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Comment by Samar kabeer on April 7, 2018 at 6:17pm

जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब, उर्दू अल्फ़ाज़ के इस्तेमाल से बहुत ख़ूबसूरत अतुकान्त कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'उसका क्या ? आया,बहकाकर चला गया'

चूँकि ऊपर की पंक्ति में 'फ़ना' शब्द है इसकी मुनासिबत से इस पंक्ति में 'बहका कर' मुनासिब नहीं लगता,इसकी जगह अगर यूँ करें  "फ़ना कर के चला गया" तो भाव भी वही रहेंगे और कसावट भी आ जायेगी,आपका क्या ख़याल है?

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